फिल्म ‘चांद मेरा दिल’ 22 मई 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है। करण जौहर के धर्मा प्रोडक्शंस के बैनर तले बनी और विवेक सोनी द्वारा निर्देशित इस फिल्म से दर्शकों को काफी उम्मीदें थीं, विशेषकर इसके खूबसूरत गानों के चलते। लेकिन क्या यह फिल्म सिर्फ शानदार गानों और बेहतरीन अभिनय के दम पर दर्शकों का दिल जीतने में कामयाब रही? आइए जानते हैं इस विस्तृत रिव्यू में:
- कलाकार: अनन्या पांडे, लक्ष्य, आस्था सिंह और प्रथम राठौड़.
- निर्देशक: विवेक सोनी.
- लेखक: विवेक सोनी और तुषार परांजपे.
- रेटिंग: 3/5.
क्या है फिल्म की कहानी?
कहानी कॉलेज लाइफ से शुरू होने वाले एक युवा जोड़े की है। इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ाई के दौरान आरव (लक्ष्य) और चांदनी (अनन्या पांडे) को एक-दूसरे से गहरा प्यार हो जाता है। दोनों से एक गलती (अनप्लांड प्रेग्नेंसी) हो जाती है और वे परिवारों के खिलाफ जाकर कम उम्र में ही शादी के बंधन में बंध जाते हैं। शादी के बाद असली दुनिया की जिम्मेदारियां, आर्थिक तनाव, करियर की उलझनें और कम उम्र का अनुभवहीनता जल्द ही दोनों के बीच दूरियां पैदा करने लगती हैं। इसके बाद शुरू होता है रिश्तों के टूटने, पार्टनर से अपेक्षाओं, दर्द, इंतजार और इम्तिहान का एक ऐसा सफर जो दर्शकों को काफी वास्तविक लगता है।
अभिनय: अनन्या का 2.0 वर्जन और लक्ष्य का जलवा
अनन्या पांडे: इस फिल्म में आपको अनन्या का एक नया और सुधरा हुआ ‘2.0 वर्जन’ देखने को मिलेगा। उन्होंने अपनी पुरानी छवि से हटकर बेहद संजीदा अभिनय किया है. भारी इमोशनल सीन्स और जहां चांदनी प्यार से ऊपर अपने आत्मसम्मान को चुनती है, वहां अनन्या ने कमाल का ठहराव दिखाया है।
- लक्ष्य: लक्ष्य स्क्रीन पर पूरी तरह से ‘सुपरस्टार मटेरियल’ नजर आते हैं. उनके अभिनय में कई जगहों पर रणबीर कपूर की झलक मिलती है। प्यार, गुस्सा, असुरक्षा, दर्द और पछतावे जैसे जटिल इमोशन्स को उन्होंने अपने किरदार में बखूबी जिया है।
फिल्म पूरी तरह से इन दोनों के कंधों पर टिकी है, क्योंकि बाकी सह-कलाकारों को ज्यादा स्क्रीन टाइम नहीं मिला है।
निर्देशन और लेखन: कहां रह गई कमी?
फिल्म के निर्देशक विवेक सोनी (जो पहले ‘मीनाक्षी सुंदरेश्वर’ बना चुके हैं) इस बार भी एक अलग तरह का आधुनिक घरेलू रोमांस लेकर आए थे. फिल्म की शुरुआत भी काफी अच्छी और रिफ्रेशिंग है। इंटरवल से पहले शहरी रोमांस और शुरुआती पैरेंटहुड के संघर्षों को बहुत अच्छे से बुना गया है।
कमजोरी:
फिल्म की असली कमजोरी इसका सेकेंड हाफ (इंटरवल के बाद) और भटका हुआ स्क्रीनप्ले है। दूसरे भाग में कहानी इतनी बोझिल हो जाती है और इसे इधर-उधर घुमाया जाता है कि दर्शक फिल्म खत्म होने का इंतजार करने लगते हैं। लेखक (विवेक, तुषार परांजपे और अक्षत घिल्डियाल) कहानी को एक सही और सटीक दिशा देने में चूक गए। अंत में लव ट्राएंगल का एंगल डालने और जबरन ‘हैप्पी एंडिंग’ के फॉर्मूले में फंसने की वजह से क्लाइमैक्स पूरी तरह से गड़बड़ हो जाता है।
देखें या न देखें?
यदि आप अनन्या पांडे और लक्ष्य की बेहतरीन ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री, उनका शानदार अभिनय और सचिन-जिगर का अच्छा संगीत देखना-सुनना चाहते हैं, तो यह फिल्म एक बार देखी जा सकती है। विशेषकर वे लोग जो किसी टूटे हुए रिश्ते या व्यावहारिक जीवन के उतार-चढ़ाव से गुजरे हैं, वे इससे खुद को जुड़ा हुआ महसूस कर सकते हैं। लेकिन अगर आप एक परफेक्ट और कसी हुई लव स्टोरी की उम्मीद कर रहे हैं, तो इसके भटके हुए क्लाइमैक्स से आपको थोड़ी निराशा हो सकती है।


