अमरीकी सीनेट (अमरीकी संसद का उच्च सदन) ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के युद्ध अधिकारों (War Powers) को सीमित करने वाले एक अहम प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। सीनेट में डेमोक्रेटिक पार्टी को सात बार लगातार विफलता मिलने के बाद यह आठवीं कोशिश में मिली एक बड़ी कामयाबी है। यह प्रस्ताव मुख्य रूप से ईरान के खिलाफ बिना संसद की मंजूरी के सैन्य कार्रवाई करने की राष्ट्रपति की शक्तियों पर रोक लगाने के लिए लाया गया है।
मुख्य बिंदु और वोटिंग समीकरण
- वोटों का गणित: इस प्रस्ताव को सीनेट में 50-47 के अंतर से मंजूरी मिली। प्रस्ताव को सीनेट की समिति से निकालकर मुख्य पटल पर चर्चा और वोटिंग के लिए लाने के पक्ष में यह बहुमत मिला।
- दलबदल और अनुपस्थिति: विपक्षी डेमोक्रेट्स को इस जीत तक पहुंचाने में चार रिपब्लिकन सांसदों (बिल कैसीडी, सुसान कोलिन्स, लिसा मुर्कोव्स्की और रैंड पॉल) ने अपनी ही पार्टी के राष्ट्रपति के खिलाफ जाकर वोट किया। वहीं, तीन रिपब्लिकन सांसद वोटिंग के दौरान अनुपस्थित रहे, जिसने इस पासे को पलट दिया।
- डेमोक्रेटिक खेमे में फूट: दिलचस्प बात यह रही कि जहां चार रिपब्लिकन ने प्रस्ताव का समर्थन किया, वहीं पेन्सिलवेनिया से डेमोक्रेटिक सांसद जॉन फेटरमैन ने अपनी पार्टी के खिलाफ जाकर इसके विरोध में वोट डाला।
टिम केन का प्रस्ताव: क्यों पड़ी इसकी जरूरत?
यह प्रस्ताव वर्जीनिया से डेमोक्रेटिक सीनेटर टिम केन (Tim Kaine) द्वारा पेश किया गया था। इस प्रस्ताव का सीधा उद्देश्य राष्ट्रपति को यह निर्देश देना है कि वह संसद (कांग्रेस) की स्पष्ट मंजूरी या युद्ध की आधिकारिक घोषणा के बिना ईरान के खिलाफ चल रही सैन्य गतिविधियों या संघर्षों से अमेरिकी सेना को पीछे हटाएं।
‘ऑपरेशन एपिक फरी’ के तहत ईरान और अमेरिका के बीच सैन्य संघर्ष देखने को मिला था, जिसके बाद वर्तमान में एक नाजुक युद्धविराम (fragile ceasefire) लागू है। विपक्षी सांसदों का आरोप है कि ट्रंप प्रशासन संसद को अंधेरे में रखकर बिना संवैधानिक मंजूरी के युद्ध जैसी स्थितियां पैदा कर रहा है।
हालांकि यह प्रस्ताव अभी सीनेट के शुरुआती पड़ाव पर है और इसे आगे प्रतिनिधि सभा (House of Representatives) से भी पास होना होगा। यदि यह दोनों सदनों से पास हो भी जाता है, तो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पास इसे ‘वीटो’ करने (रद्द करने) का अधिकार सुरक्षित है। इसके बावजूद, इस कदम को राष्ट्रपति की असीमित सैन्य शक्तियों पर अंकुश लगाने और संसद की सर्वोच्चता को बहाल करने की दिशा में एक बड़ा राजनीतिक संदेश माना जा रहा है।


