देशभर में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में हुई करीब 3 रुपये प्रति लीटर की भारी बढ़ोतरी के बाद अब इसका सीधा असर गिग इकोनॉमी (Gig Economy) पर दिखने लगा है। तेल कंपनियों के इस फैसले से नाराज ऐप-आधारित डिलीवरी और ट्रांसपोर्ट वर्कर्स ने शनिवार (16 मई 2026) को देशव्यापी हड़ताल का आह्वान किया है। ‘गिग एंड प्लेटफॉर्म सर्विस वर्कर्स यूनियन’ (GIPSWU) ने शनिवार दोपहर 12 बजे से शाम 5 बजे तक पांच घंटे के लिए सभी ऐप-आधारित सेवाओं को पूरी तरह बंद रखने (शटडाउन) की अपील की है। इस हड़ताल के कारण जोमैटो, स्विगी, ब्लिंकिट और ज़ेप्टो जैसी प्रमुख फूड व ग्रोसरी डिलीवरी सेवाओं के साथ-साथ ओला, उबर और रैपिडो जैसी राइड-हेलिंग सेवाएं भी प्रभावित रहने की आशंका है।
20 रुपये प्रति किलोमीटर भुगतान की मांग
यूनियन ने केंद्र सरकार और डिजिटल प्लेटफॉर्म कंपनियों के सामने अपनी मांगें रखते हुए डिलीवरी और ट्रांसपोर्ट वर्कर्स के लिए न्यूनतम 20 रुपये प्रति किलोमीटर का सर्विस रेट तय करने की मांग की है।
गिग वर्कर्स का कहना है कि लगभग चार साल बाद पेट्रोल-डीजल की कीमतों में इतनी बड़ी एकमुश्त बढ़ोतरी की गई है, जिससे दिल्ली में पेट्रोल की कीमत करीब 97.77 रुपये प्रति लीटर और डीजल 90.67 रुपये प्रति लीटर पर पहुंच गया है। इस बढ़ोतरी का पूरा वित्तीय बोझ सीधे उन वर्कर्स पर पड़ रहा है जो डिलीवरी के लिए अपने व्यक्तिगत मोटरसाइकिल और स्कूटर का इस्तेमाल करते हैं।
लगभग 1.2 करोड़ वर्कर्स प्रभावित
GIPSWU की राष्ट्रीय अध्यक्ष सीमा सिंह ने एक बयान में कहा, “ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी और हाल ही में बढ़े घरेलू एलपीजी सिलेंडर के दामों ने उन वर्कर्स पर आर्थिक दबाव बेहद बढ़ा दिया है, जो पहले से ही बढ़ती महंगाई से जूझ रहे हैं। अगर कंपनियां तुरंत अपने भुगतान (पेआउट) ढांचे में बदलाव नहीं करती हैं, तो कई वर्कर्स इस सेक्टर को छोड़ने पर मजबूर हो जाएंगे।” यूनियन के अनुसार, इस मूल्य वृद्धि से देश के करीब 1.2 करोड़ गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स सीधे तौर पर प्रभावित हो रहे हैं।
कंपनियों और सरकार को सौंपा ज्ञापन
यूनियन ने भारत सरकार के साथ-साथ ज़ोमैटो, स्विगी, ब्लिंकिट, ज़ेप्टो, डंज़ो, ओला, उबर, रैपिडो, पोर्टर और अमेज़न फ्लेक्स जैसी बड़ी कंपनियों को एक ज्ञापन (Memorandum) सौंपा है। यूनियन के राष्ट्रीय समन्वयक निर्मल गोराना ने स्पष्ट किया कि चूंकि ये वर्कर्स ईंधन और वाहन के रखरखाव का खर्च खुद उठाते हैं, इसलिए वे ईंधन की कीमतों में उतार-चढ़ाव के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील हैं। उन्होंने कंपनियों से मांग की है कि ईंधन की बढ़ी हुई कीमतों का बोझ वर्कर्स पर डालने के बजाय कंपनियां अपने पेआउट रेट्स में तत्काल संशोधन करें। गौरतलब है कि इससे पहले दिसंबर 2025 में भी त्वरित डिलीवरी (10-मिनट डिलीवरी) और कम वेतन के खिलाफ देशव्यापी विरोध प्रदर्शन हुए थे।


