कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सांसद शशि थरूर ने संसद में एक महत्वपूर्ण चर्चा के दौरान देश की भावी राजनीतिक और संवैधानिक दिशा को लेकर चिंताएं व्यक्त की हैं। विशेष रूप से आगामी परिसीमन प्रक्रिया और संविधान में होने वाले संभावित संशोधनों को लेकर उन्होंने सरकार को गंभीर चेतावनी दी है।
परिसीमन: संघीय संतुलन पर खतरा
थरूर ने अपने संबोधन में परिसीमन (Delimitation) को एक अत्यंत संवेदनशील मुद्दा बताते हुए आगाह किया कि यदि इसे केवल जनसंख्या के आधार पर लागू किया गया, तो यह देश के संघीय ढांचे के लिए हानिकारक साबित हो सकता है।
- दक्षिण भारत का प्रतिनिधित्व: थरूर ने तर्क दिया कि दक्षिण के राज्यों ने पिछले दशकों में जनसंख्या नियंत्रण और सामाजिक विकास के मानकों पर बेहतर कार्य किया है। यदि परिसीमन का एकमात्र मानक जनसंख्या को बनाया जाता है, तो इन राज्यों को संसद में अपने प्रतिनिधित्व में भारी कमी का सामना करना पड़ सकता है।
- राजनीतिक असंतुलन: उन्होंने स्पष्ट किया कि इससे उत्तर और दक्षिण भारत के बीच का राजनीतिक संतुलन बिगड़ सकता है, जो देश की एकता और समावेशी प्रतिनिधित्व की भावना के विपरीत होगा।
संविधान संशोधन पर सतर्कता
परिसीमन के अलावा, थरूर ने संविधान में होने वाले किसी भी प्रकार के बदलावों को लेकर अत्यधिक सावधानी बरतने की अपील की।
- लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा: उनका मानना है कि संविधान के ‘मूल ढांचे’ (Basic Structure) के साथ कोई भी छेड़छाड़ लोकतांत्रिक व्यवस्था की नींव को कमजोर कर सकती है।
- व्यापक विमर्श की आवश्यकता: थरूर ने जोर देकर कहा कि संसद में किसी भी बड़े संवैधानिक बदलाव को लाने से पहले सभी हितधारकों के साथ गहन विमर्श होना अनिवार्य है, ताकि लोकतंत्र में ‘चेक एंड बैलेंस’ की प्रणाली बनी रहे।
- शशि थरूर का यह बयान ऐसे समय में आया है जब देश में परिसीमन प्रक्रिया को लेकर अटकलें तेज हैं। विपक्षी दलों की ओर से यह एक प्रमुख चिंता का विषय बना हुआ है कि परिसीमन के दौरान राज्यों की विविध जनसांख्यिकीय स्थितियों और उनके विकास के स्तर को नजरअंदाज न किया जाए। थरूर की टिप्पणी ने इस राष्ट्रीय बहस को फिर से केंद्र में ला दिया है कि भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में राजनीतिक प्रतिनिधित्व का न्यायसंगत आधार क्या होना चाहिए।


