More
    HomeHindi NewsBusinessपड़ोसी देशों से सस्ता है भारतीय सिलेंडर, भारी घाटा, जानें सरकार ने...

    पड़ोसी देशों से सस्ता है भारतीय सिलेंडर, भारी घाटा, जानें सरकार ने क्यों नहीं बढ़ाई कीमतें?

    भारत में एलपीजी (LPG) की कीमतों को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच केंद्र सरकार और तेल विपणन कंपनियों (OMCs) की ओर से एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट सामने आई है। वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल और गैस की कीमतों में भारी अस्थिरता के बावजूद, भारत सरकार ने घरेलू रसोई गैस की कीमतों को नियंत्रित रखने का फैसला किया है।

    ₹380 प्रति सिलेंडर का भारी घाटा

    सरकारी आंकड़ों के अनुसार, सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियां—इंडियन ऑयल (IOC), भारत पेट्रोलियम (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम (HPCL)—वर्तमान में घरेलू 14.2 किलोग्राम वाले एलपीजी सिलेंडर की बिक्री पर औसतन 380 रुपये प्रति सिलेंडर का घाटा (Under-recovery) सह रही हैं।

    • कुल घाटे का अनुमान: चालू वित्त वर्ष के मई अंत तक इन कंपनियों का कुल घाटा 40,484 करोड़ रुपये तक पहुंचने की आशंका है।
    • पिछला रिकॉर्ड: पिछले साल भी कुल घाटा 60,000 करोड़ रुपये रहा था, जिसमें से 30,000 करोड़ रुपये का बोझ सरकार ने सब्सिडी के रूप में उठाया था और शेष 30,000 करोड़ रुपये का नुकसान कंपनियों ने वहन किया।

    पड़ोसी देशों से सस्ता है भारतीय सिलेंडर

    रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया है कि दक्षिण एशियाई देशों की तुलना में भारत में रसोई गैस की कीमतें काफी प्रतिस्पर्धी और कम हैं।

    • भारत: घरेलू सिलेंडर की कीमत लगभग 913 रुपये (दिल्ली)।
    • पाकिस्तान: यहाँ सिलेंडर की कीमत 1,046 रुपये के आसपास है।
    • नेपाल: यहाँ उपभोक्ताओं को 1,208 रुपये चुकाने पड़ रहे हैं।
    • श्रीलंका: आर्थिक संकटों के बीच यहाँ कीमत 1,242 रुपये तक पहुंच गई है।

    सरकार ने क्यों नहीं बढ़ाई कीमतें?

    ईंधन की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में भारी उछाल के बावजूद सरकार द्वारा कीमतें न बढ़ाने के पीछे कई ठोस कारण बताए गए हैं:

    1. महंगाई पर नियंत्रण: सरकार का मानना है कि रसोई गैस की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर आम आदमी की थाली पर पड़ता है। मुद्रास्फीति (Inflation) को थामने के लिए ईंधन की कीमतों को स्थिर रखना एक रणनीतिक निर्णय है।
    2. सामाजिक सुरक्षा: उज्ज्वला योजना के तहत करोड़ों गरीब परिवारों को गैस कनेक्शन दिए गए हैं। कीमतों में भारी वृद्धि इन परिवारों को फिर से पारंपरिक ईंधन (लकड़ी/कोयला) की ओर धकेल सकती है, जो स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए हानिकारक है।
    3. चुनाव और राजनीतिक संवेदनशीलता: पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के कारण पहले ही पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर दबाव है, ऐसे में सरकार घरेलू मोर्चे पर जनता को और अधिक वित्तीय बोझ से बचाना चाहती है।

    5 राज्यों के विधानसभा चुनाव

    भारत में ईंधन की कीमतें अक्सर चुनावी कैलेंडर से प्रभावित होती रही हैं। पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में होने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर सरकार जनता के बीच किसी भी प्रकार का असंतोष नहीं चाहती।

    विपक्ष की घेराबंदी: कीमतों में वृद्धि विपक्ष को एक बड़ा चुनावी मुद्दा दे सकती है, जिससे सत्ताधारी दल को नुकसान होने की आशंका रहती है।

    वोट बैंक पर असर: रसोई गैस की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर मध्यम और निम्न आय वर्ग के बजट पर पड़ता है, जो चुनावों में एक बड़ा निर्णायक वोट बैंक होता है।

    भविष्य की चुनौतियां

    मई के अंत तक 40,000 करोड़ रुपये से अधिक का घाटा ओएमसी कंपनियों के वित्तीय स्वास्थ्य के लिए एक बड़ी चुनौती है। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में गैस की कीमतें कम नहीं होती हैं, तो सरकार को आगामी अनुपूरक बजट में तेल कंपनियों के लिए अतिरिक्त बेलआउट पैकेज या सब्सिडी का प्रावधान करना पड़ सकता है।

    RELATED ARTICLES

    Most Popular

    Recent Comments