भारतीय टेनिस के इतिहास में जब भी सबसे बड़े योद्धा का नाम लिया जाएगा, लिएंडर पेस का नाम शीर्ष पर होगा। हाल ही में पश्चिम बंगाल चुनावों से पहले भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल होकर अपनी नई राजनीतिक पारी शुरू करने वाले पेस की खेल यात्रा किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि 1996 के अटलांटा ओलंपिक में कांस्य पदक जीतना था, जिसने भारतीय खेलों की दिशा बदल दी।
अटलांटा 1996: जब थम गई थी दुनिया
1952 के बाद भारत व्यक्तिगत ओलंपिक पदक के लिए तरस रहा था। अटलांटा ओलंपिक में वाइल्ड कार्ड के जरिए प्रवेश पाने वाले लिएंडर पेस ने दुनिया को चौंका दिया। सेमीफाइनल में उनका मुकाबला महान आंद्रे अगासी से था। हालांकि पेस वह मैच हार गए, लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी थी।
टूटी कलाई और जादुई जीत
कांस्य पदक के मुकाबले में उनका सामना ब्राजील के फर्नांडो मेलिगेनी से था। मैच के दौरान पेस की कलाई में गंभीर चोट आई थी, जिसे बाद में फ्रैक्चर (टूटी कलाई) बताया गया। दर्द इतना असहनीय था कि उनके लिए रैकेट पकड़ना भी मुश्किल था।
“मेरी कलाई में बहुत तेज दर्द था, लेकिन मेरे सामने तिरंगा था। मैंने खुद से कहा कि आज हारने का विकल्प नहीं है।” – लिएंडर पेस
पेस ने पहला सेट हारने के बाद जबरदस्त वापसी की और 3-6, 6-2, 6-4 से मैच जीतकर इतिहास रच दिया। 44 साल के सूखे को खत्म करते हुए उन्होंने भारत को टेनिस में पहला ओलंपिक पदक दिलाया।
सफलता के मुख्य आंकड़े और उपलब्धियां
लिएंडर पेस की सफलता केवल एक पदक तक सीमित नहीं रही, उन्होंने दशकों तक विश्व टेनिस पर राज किया:
| उपलब्धि | विवरण |
| ग्रैंड स्लैम खिताब | कुल 18 (8 पुरुष युगल, 10 मिश्रित युगल) |
| डेविस कप रिकॉर्ड | डेविस कप इतिहास में सबसे अधिक युगल जीत (45) |
| करियर स्लैम | युगल और मिश्रित युगल दोनों में ‘करियर ग्रैंड स्लैम’ पूरा किया |
| पद्म पुरस्कार | पद्म श्री (2001) और पद्म भूषण (2014) से सम्मानित |
एक अद्वितीय खेल विरासत
पेस के खून में ही खेल था। उनके पिता वेस पेस 1972 ओलंपिक कांस्य पदक विजेता हॉकी टीम का हिस्सा थे, जबकि उनकी मां जेनिफर पेस भारतीय बास्केटबॉल टीम की कप्तान रही थीं। पेस ने न केवल अपने माता-पिता की विरासत को आगे बढ़ाया, बल्कि महेश भूपति के साथ मिलकर जोड़ी बनाई, जिसने भारत को युगल टेनिस में विश्व नंबर-1 बनाया।
सियासत के मैदान में नई चुनौती
52 वर्ष की आयु में लिएंडर पेस ने अब राजनीति का रुख किया है। खेल के मैदान पर असंभव को संभव करने वाले पेस से अब उम्मीद है कि वे उसी ‘चैंपियन मानसिकता’ के साथ जनसेवा में अपना योगदान देंगे। उनकी कहानी आज भी करोड़ों युवाओं के लिए प्रेरणा है कि यदि इरादे फौलादी हों, तो टूटी कलाई भी इतिहास रच सकती है।


