पश्चिम एशिया में जारी युद्ध और बढ़ती एलपीजी (LPG) की कीमतों के बीच, गुजरात के बनासकांठा जिले से एक ऐसी ‘सक्सेस स्टोरी’ सामने आई है, जो पूरे भारत के लिए ऊर्जा आत्मनिर्भरता का नया मार्ग प्रशस्त कर रही है। बनास डेयरी (Banas Dairy) का ‘बायो-सीएनजी’ (Bio-CNG) मॉडल आज न केवल ‘वेस्ट टू वेल्थ’ (Waste to Wealth) का प्रतीक बन गया है, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आत्मनिर्भर भारत के सपने को भी साकार कर रहा है।
क्या है बनास बायो-सीएनजी मॉडल?
गुजरात के दामा (Dama) गांव में स्थित यह देश का पहला ऐसा प्रोजेक्ट है, जो सीधे तौर पर पशुपालकों से गोबर खरीदकर उसे ईंधन में बदलता है। इस प्लांट में हर दिन 1800 किलोग्राम (1.8 टन) बायो-सीएनजी का उत्पादन होता है। इसके लिए आसपास के गांवों के किसानों से प्रतिदिन भारी मात्रा में गोबर खरीदा जाता है।
किसानों की ‘डबल कमाई’ का जरिया
बनास डेयरी का यह मॉडल डेयरी उद्योग के पारंपरिक स्वरूप को बदल रहा है:
- गोबर की कीमत: पहले जिस गोबर को किसान बेकार समझते थे या केवल खाद के रूप में इस्तेमाल करते थे, अब बनास डेयरी उसे ₹1 से ₹1.50 प्रति किलो की दर से खरीद रही है।
- अतिरिक्त आय: एक औसत किसान, जिसके पास 5-10 पशु हैं, वह केवल गोबर बेचकर महीने के ₹5,000 से ₹10,000 तक अतिरिक्त कमा रहा है।
- जैविक खाद: गैस निकालने के बाद जो अवशेष (Slurry) बचता है, उसे उच्च गुणवत्ता वाली ‘सॉलिड’ और ‘लिक्विड’ जैविक खाद में बदलकर वापस किसानों को सस्ते दामों पर दिया जाता है।
एलपीजी संकट के बीच एक “वरदान”
मौजूदा समय में, जब ईरान-इजराइल और अमेरिका के बीच तनाव के कारण कच्चे तेल और एलपीजी की आपूर्ति बाधित हो रही है, यह मॉडल एक गेम-चेंजर साबित हो रहा है:
- सस्ता ईंधन: बायो-सीएनजी की कीमत पारंपरिक सीएनजी और एलपीजी के मुकाबले काफी कम है।
- स्वच्छ ऊर्जा: यह पूरी तरह से प्रदूषण मुक्त ईंधन है, जिससे कार्बन उत्सर्जन में भारी कमी आती है।
- स्थानीय समाधान: गैस के लिए विदेशों पर निर्भर रहने के बजाय, गांव का कचरा ही गांव की ऊर्जा जरूरतों को पूरा कर रहा है।
पीएम मोदी का विजन और भविष्य
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस प्रोजेक्ट की सराहना करते हुए इसे ‘गोवर्धन योजना’ का सबसे सफल उदाहरण बताया है।बनास डेयरी अब इस मॉडल को पूरे जिले में फैलाने की योजना बना रही है। आने वाले समय में गुजरात के विभिन्न हिस्सों में ऐसे दर्जनों प्लांट लगाने का लक्ष्य है। यदि यह मॉडल पूरे देश में लागू होता है, तो भारत अपनी रसोई गैस (LPG) की जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा घरेलू स्तर पर ही पूरा कर सकेगा।
चुनौतियां और समाधान
हालांकि, गोबर के संग्रहण (Collection) और ट्रांसपोर्टेशन में कुछ चुनौतियां आती हैं, लेकिन बनास डेयरी ने इसके लिए ‘गोबर बैंक’ और विशेष वाहनों की व्यवस्था की है। बनास बायो-सीएनजी मॉडल यह साबित करता है कि अगर सही तकनीक और इच्छाशक्ति हो, तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था को कचरे के माध्यम से भी सोने में बदला जा सकता है। यह मॉडल न केवल पर्यावरण के अनुकूल है, बल्कि वैश्विक युद्धों के कारण होने वाली महंगाई से भी आम आदमी को सुरक्षा कवच प्रदान करता है।


