मार्च 2026 में मध्य-पूर्व में ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक तेल बाजार में भारी उथल-पुथल मचा दी है। ईरान द्वारा क्षेत्र के आर्थिक केंद्रों को निशाना बनाने और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में तेल आपूर्ति बाधित करने की धमकियों ने कच्चे तेल की कीमतों को आसमान पर पहुंचा दिया है, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर चिंता के बादल छा गए हैं।
तनाव और बाजार का हाल:
- ऐतिहासिक उछाल: ईरान-इजरायल संघर्ष के कारण तेल की कीमतों में भारी वृद्धि हुई है। रिपोर्टों के अनुसार, ब्रेंट क्रूड की कीमतें $100 प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं, जो यूक्रेन-रूस युद्ध के बाद की सबसे बड़ी तेजी है। इससे वैश्विक शेयर बाजारों में भी भारी गिरावट देखी गई है।
- होर्मुज जलडमरूमध्य का संकट: वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 20% हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। इस मार्ग पर बढ़ते तनाव और ईरान की आक्रामक कार्रवाइयों ने समुद्री यातायात को लगभग ठप कर दिया है, जिससे तेल और प्राकृतिक गैस का निर्यात गंभीर रूप से प्रभावित हुआ है।
- अमेरिका का रणनीतिक कदम: स्थिति की गंभीरता को देखते हुए, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का प्रशासन हरकत में आया है। वैश्विक तेल आपूर्ति को सुचारू बनाए रखने और कीमतों को नियंत्रित करने के उद्देश्य से, अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने भारतीय रिफाइनरियों को रूस से तेल खरीदने के लिए 30 दिन की अस्थायी छूट (waiver) दी है। यह छूट मुख्य रूप से समुद्र में फंसे रूसी तेल के उन कार्गो के लिए है जो 5 मार्च, 2026 से पहले लोड किए गए थे।
क्यों जरूरी है यह कदम?
अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि यह निर्णय रूस के प्रति उनकी नीति में बदलाव नहीं है, बल्कि एक अल्पकालिक रणनीतिक कदम है। इसका मुख्य उद्देश्य वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की उपलब्धता बनाए रखना और बढ़ती कीमतों के दबाव को कम करना है। भारत, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए काफी हद तक आयात पर निर्भर है, के लिए यह निर्णय घरेलू ईंधन आपूर्ति की स्थिरता सुनिश्चित करने में सहायक है।
हालाँकि, स्थिति अभी भी बेहद नाजुक बनी हुई है। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि भू-राजनीतिक तनाव और आपूर्ति श्रृंखला में रुकावटें जारी रहीं, तो वैश्विक मुद्रास्फीति और ऊर्जा सुरक्षा पर इसका गहरा असर पड़ सकता है। निवेशक और देश इस अनिश्चितता के दौर में सतर्क रुख अपना रहे हैं।


