मिडिल ईस्ट में जारी भीषण जंग और समुद्र में गिरती मिसाइलों के बीच एक भारतीय तेल टैंकर ने ‘मौत के गलियारे’ यानी होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को पार कर एक नया इतिहास रच दिया है। यह टैंकर न केवल सुरक्षित बाहर निकला, बल्कि इसने ईरान की कड़ी घेराबंदी को चकमा देने के लिए एक ‘अदृश्य’ रणनीति अपनाई।
अदृश्य होने की रणनीति
AIS को किया बंद रिपोर्ट्स के अनुसार, लाइबेरिया के झंडे वाले इस टैंकर ने होर्मुज स्ट्रेट में प्रवेश करने से पहले अपना ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम (AIS) बंद कर दिया था। AIS बंद होने का मतलब है कि समुद्री रडार और ट्रैकिंग वेबसाइट्स (जैसे MarineTraffic) पर जहाज दिखना बंद हो गया। युद्ध क्षेत्र में अपनी स्थिति को गुप्त रखने के लिए यह एक जोखिम भरा लेकिन जरूरी कदम था ताकि दुश्मन की मिसाइलें इसे निशाना न बना सकें।
मिसाइलों के बीच कैसे बचा टैंकर?
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया का सबसे संकीर्ण और संवेदनशील समुद्री रास्ता है, जहाँ ईरान और अमेरिका/इजरायल के बीच मिसाइल युद्ध चल रहा है। इस ‘मौत के गलियारे’ को पार करने के लिए भारतीय टैंकर ने निम्नलिखित रणनीतियां अपनाईं:
- साइलेंट मोड: AIS बंद करने के साथ-साथ संचार को न्यूनतम रखा गया।
- ईरान से गुप्त सहमति: जैसा कि हाल ही में विदेश मंत्री जयशंकर और ईरानी विदेश मंत्री के बीच बात हुई थी, माना जा रहा है कि भारतीय हितों को देखते हुए ईरान ने इस टैंकर को ‘सॉफ्ट सिग्नल’ दिया था।
- तटीय सीमाओं का सहारा: टैंकर ने अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र के बजाय सुरक्षित तटीय सीमाओं के करीब से अपनी यात्रा पूरी की।
भारत के लिए क्यों है यह बड़ी जीत?
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से पूरा करता है। इस टैंकर का सुरक्षित पहुंचना निम्नलिखित कारणों से महत्वपूर्ण है।
- कच्चे तेल की आपूर्ति: यदि होर्मुज का रास्ता बंद होता, तो भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें आसमान छूने लगतीं।
- बीमा और शिपिंग: युद्ध के कारण समुद्री बीमा (War Risk Insurance) की दरें 500% तक बढ़ गई हैं। सफल पारगमन से अन्य कंपनियों का भी हौसला बढ़ा है।
- कूटनीतिक सफलता: यह भारत की उस ‘न्यूट्रल’ कूटनीति का परिणाम है, जिसके कारण युद्धरत ईरान ने भी भारतीय कार्गो को रास्ता दिया।
होर्मुज स्ट्रेट का महत्व
यह दुनिया का वह ‘चोक पॉइंट’ है जहाँ से वैश्विक तेल का करीब 20-30% हिस्सा गुजरता है। ओमान और ईरान के बीच स्थित यह रास्ता मात्र 33 किलोमीटर चौड़ा है, जिससे इसे नियंत्रित करना और निशाना बनाना बेहद आसान होता है।


