भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के पश्चिम बंगाल दौरे के दौरान प्रोटोकॉल के कथित उल्लंघन को लेकर केंद्र सरकार और राज्य प्रशासन के बीच तनाव बढ़ गया है। गृह मंत्रालय ने इस घटना को गंभीरता से लेते हुए पश्चिम बंगाल सरकार से विस्तृत रिपोर्ट तलब की है।
विवाद का मुख्य कारण: प्रोटोकॉल में चूक
रिपोर्ट्स के अनुसार, विवाद तब शुरू हुआ जब राष्ट्रपति मुर्मू एक आधिकारिक कार्यक्रम के लिए कोलकाता पहुंचीं। प्रोटोकॉल के अनुसार, राज्य के मुख्यमंत्री या राज्यपाल को हवाई अड्डे पर राष्ट्रपति की अगवानी करनी अनिवार्य होती है। हालांकि, इस दौरान वरिष्ठ स्तर की अनुपस्थिति और सुरक्षा व्यवस्था में ढिलाई के आरोप लगे हैं।
प्रमुख बिंदु:
- अगवानी में कमी: प्रोटोकॉल के तहत निर्धारित गणमान्य व्यक्तियों की अनुपस्थिति को केंद्र ने “संवैधानिक मर्यादा का उल्लंघन” माना है।
- सुरक्षा घेरा: राष्ट्रपति की सुरक्षा (Z+ Blue Book) के मानकों के अनुरूप कुछ स्थानों पर बैरिकेडिंग और ट्रैफिक नियंत्रण में खामियां पाई गईं।
- अधिकारियों की गैर-मौजूदगी: कुछ महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में वरिष्ठ नौकरशाहों और पुलिस अधिकारियों की कमी भी विवाद का विषय बनी है।
केंद्र की सख्त प्रतिक्रिया
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव को पत्र लिखकर 24 घंटे के भीतर स्पष्टीकरण मांगा है। केंद्र का तर्क है कि राष्ट्रपति देश का प्रथम नागरिक होता है और उनके दौरे की व्यवस्था में किसी भी प्रकार की कोताही स्वीकार्य नहीं है।
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की राज्य इकाई ने ममता बनर्जी सरकार पर जानबूझकर राष्ट्रपति का अपमान करने का आरोप लगाया है। शुभेंदु अधिकारी ने इसे “संवैधानिक संकट” करार देते हुए राज्यपाल से हस्तक्षेप की मांग की है।
राज्य सरकार का पक्ष
दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस (TMC) और राज्य सरकार के सूत्रों ने इन आरोपों को “राजनीति से प्रेरित” बताया है। राज्य प्रशासन का कहना है कि मुख्यमंत्री की व्यस्तताओं की सूचना पहले ही दी जा चुकी थी और उनकी जगह एक वरिष्ठ मंत्री को प्रतिनिधि के तौर पर भेजा गया था। राज्य ने दावा किया है कि सुरक्षा व्यवस्था में कोई कमी नहीं थी और सभी मानक प्रक्रियाओं का पालन किया गया।
आगे क्या?
यह पहली बार नहीं है जब केंद्र और पश्चिम बंगाल सरकार के बीच किसी दौरे या प्रोटोकॉल को लेकर टकराव हुआ है। यदि राज्य सरकार का जवाब संतोषजनक नहीं पाया जाता है, तो केंद्र इस मामले में कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई या आधिकारिक निंदा प्रस्ताव की दिशा में बढ़ सकता है।


