हाल ही में ईरान के युद्धपोत ‘IRIS लावन’ (IRIS Lavan) को कोच्चि बंदरगाह पर शरण देने को लेकर मचे अंतरराष्ट्रीय विवाद पर भारत ने अपना रुख स्पष्ट कर दिया है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने इस फैसले के पीछे की असली वजह बताते हुए इसे पूरी तरह ‘मानवीय आधार’ (Humanitarian Grounds) पर लिया गया निर्णय बताया है।
क्या था पूरा मामला?
अमेरिकी नौसेना और कुछ अन्य देशों ने भारत के इस कदम पर कड़ी आपत्ति जताई थी, क्योंकि ईरान का यह युद्धपोत उस समय संघर्ष क्षेत्र से बाहर निकलकर हिंद महासागर में था। आरोप लगाए गए थे कि भारत ईरान को एक ‘सुरक्षित पनाहगाह’ प्रदान कर रहा है।
विदेश मंत्री जयशंकर की सफाई
जयशंकर ने स्पष्ट किया कि युद्धपोत में तकनीकी समस्या थी। अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून के तहत, किसी भी देश का यह कर्तव्य है कि वह संकट में फंसे जहाजों को मदद दे, चाहे वह किसी भी देश का क्यों न हो।
- भारत ने किसी भी तरह के ‘सैन्य गठबंधन’ या ईरान के पक्ष में खड़े होने के दावों को खारिज कर दिया। विदेश मंत्री ने कहा कि भारत की विदेश नीति ‘वसुधैव कुटुंबकम’ पर आधारित है, जो आपदा के समय किसी को भी मरने के लिए नहीं छोड़ती।
- उन्होंने आश्वस्त किया कि भारतीय नौसेना ने जहाज की पूरी जांच की थी और यह सुनिश्चित किया था कि जहाज पर किसी भी प्रकार के प्रतिबंधित हथियार या परमाणु सामग्री नहीं थी।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर प्रभाव
अमेरिका और इस्राइल के साथ भारत के संबंधों पर इस फैसले का असर पड़ने की चर्चाओं को भी जयशंकर ने सिरे से खारिज किया। उन्होंने कहा कि मित्र देशों के साथ हमारे संबंध मजबूत हैं और वे भारत के मानवीय दृष्टिकोण को समझते हैं। यह घटना दर्शाती है कि पश्चिम एशिया में बढ़ते युद्ध के माहौल में भारत कितनी सावधानी से अपनी ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ को बनाए हुए है, जहाँ वह एक तरफ अपने मानवीय मूल्यों को प्राथमिकता दे रहा है, तो दूसरी तरफ बड़े देशों के साथ अपने कूटनीतिक रिश्तों को भी संतुलित कर रहा है।


