बिहार की राजनीति में आज का दिन एक ऐतिहासिक मोड़ के रूप में दर्ज किया गया है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्यसभा के लिए नामांकन दाखिल कर अपनी दिल्ली की राह चुन ली है। 2005 से शुरू हुआ बिहार का ‘नीतीश युग’ अब एक नए बदलाव की ओर अग्रसर है।
इस बड़े घटनाक्रम से बिहार की सियासत में होने वाले मुख्य बदलाव निम्नलिखित हैं:
1. पहली बार भाजपा का मुख्यमंत्री?
बिहार में भाजपा ने अब तक हमेशा नीतीश कुमार के नेतृत्व में ‘जूनियर पार्टनर’ की भूमिका निभाई है। नीतीश कुमार के इस्तीफे के बाद अब यह लगभग तय है कि बिहार को अपना पहला भाजपाई मुख्यमंत्री मिलेगा।
- संभावित चेहरे: मुख्यमंत्री की रेस में डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी का नाम सबसे आगे है। इसके अलावा नित्यानंद राय और दिलीप जायसवाल के नामों पर भी चर्चा है।
2. जदयू (JDU) के अस्तित्व पर सवाल
नीतीश कुमार न केवल बिहार के मुख्यमंत्री रहे हैं, बल्कि जदयू के मुख्य स्तंभ भी हैं। उनके राष्ट्रीय राजनीति में जाने से पार्टी के भविष्य पर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं:
- उत्तराधिकार की चुनौती: क्या जदयू बिना नीतीश के बिहार में अपना जनाधार बचा पाएगी?
- निशांत कुमार की एंट्री: चर्चा है कि नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार सक्रिय राजनीति में आ सकते हैं और उन्हें नई सरकार में डिप्टी सीएम की जिम्मेदारी दी जा सकती है।
3. सामाजिक समीकरणों में बदलाव
नीतीश कुमार का ‘लव-कुश’ (कुर्मी-कोइरी) समीकरण और ‘अति पिछड़ा’ (EBC) वोट बैंक उनकी ताकत रहा है। उनके हटने के बाद भाजपा इन वर्गों को सीधे साधने की कोशिश करेगी। वहीं, राजद (RJD) नेता तेजस्वी यादव इस खाली स्थान को भरने के लिए अपनी रणनीति और आक्रामक कर सकते हैं।
4. सत्ता का नया ‘पावर सेंटर’
अब तक बिहार की सत्ता का केंद्र ‘एक अणे मार्ग’ (मुख्यमंत्री आवास) रहा है। नीतीश के दिल्ली जाने के बाद सत्ता की चाबी सीधे तौर पर दिल्ली (बीजेपी आलाकमान) के पास चली जाएगी।
नीतीश कुमार का राज्यसभा जाना केवल एक पद का त्याग नहीं, बल्कि बिहार की 20 साल पुरानी ‘पर्सनैलिटी-ड्रिवन’ राजनीति का अंत है। अब देखना यह है कि क्या भाजपा बिना किसी बैसाखी के बिहार की सत्ता संभाल पाएगी या विपक्ष को एक बड़ा मौका मिल गया है।


