अयातुल्ला अली खामेनेई की मृत्यु के बाद ईरान एक बड़े संवैधानिक और राजनीतिक संकट के मुहाने पर खड़ा है। भले ही अमेरिका और इजरायल ने इस हमले को अंजाम दिया हो, लेकिन ईरान के भीतर शासन बदलना इतना आसान नहीं है। ईरान की सत्ता संरचना (Power Structure) को इस तरह डिजाइन किया गया है कि एक व्यक्ति के जाने से पूरा सिस्टम धराशायी नहीं होता।
खामेनेई ने अपने जीवनकाल में ही उत्तराधिकार के लिए एक गुप्त लेकिन मजबूत योजना तैयार कर ली थी। यहाँ जानिए कौन हैं वो प्रमुख दावेदार जो ईरान की कमान संभाल सकते हैं:
1. मोजतबा खामेनेई (Mojtaba Khamenei)
अली खामेनेई के दूसरे बेटे, मोजतबा, इस दौड़ में सबसे आगे और सबसे शक्तिशाली नाम हैं।
- शैडो रूलर: उन्हें ईरान का ‘पर्दे के पीछे का शासक’ कहा जाता है। वह आधिकारिक तौर पर किसी पद पर नहीं हैं, लेकिन IRGC (रिवोल्यूशनरी गार्ड्स) पर उनकी जबरदस्त पकड़ है।
- चुनौती: ईरान के 1979 के रिवोल्यूशन का एक बड़ा सिद्धांत ‘वंशवाद’ का विरोध था। मोजतबा को नेता बनाने से जनता में विद्रोह की भावना भड़क सकती है, क्योंकि यह राजशाही (Shah’s era) की वापसी जैसा लगेगा।
2. अयातुल्ला अलीरेजा अराफी (Alireza Arafi)
67 वर्षीय अलीरेजा अराफी एक बेहद प्रभावशाली धर्मगुरु हैं और वर्तमान में ‘असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स’ के उपाध्यक्ष हैं।
- योग्यता: वह ईरान के सेमिनरी सिस्टम (मदरसों) के प्रमुख रहे हैं और गार्जियन काउंसिल के सदस्य भी हैं।
- रुझान: वह खामेनेई के बेहद भरोसेमंद हैं और उन्हें ‘सिस्टम’ का आदमी माना जाता है। यदि मोजतबा के नाम पर सहमति नहीं बनी, तो अराफी एक ‘न्यूट्रल’ और सर्वसम्मत उम्मीदवार हो सकते हैं।
3. हसन खुमैनी (Hassan Khomeini)
ईरान के संस्थापक अयातुल्ला खुमैनी के पोते होने के नाते उनके पास जबरदस्त भावनात्मक और क्रांतिकारी विरासत है।
- पेंच: वह थोड़े उदारवादी (Reformist) माने जाते हैं, जिसके कारण कट्टरपंथी धड़ा और IRGC उन्हें पसंद नहीं करता। हालांकि, खामेनेई ने हाल ही में उन्हें कुछ महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी थीं, जिससे उनके नाम की चर्चा फिर शुरू हुई है।
उत्तराधिकार की संवैधानिक प्रक्रिया
ईरान के संविधान के अनुच्छेद 111 के अनुसार:
- अस्थाई परिषद: नए नेता के चुनाव तक एक 3-सदस्यीय परिषद (राष्ट्रपति, न्यायपालिका प्रमुख और गार्जियन काउंसिल का एक सदस्य) शासन चलाएगी।
- असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स: यह 88 सदस्यीय निकाय, जिसमें सभी वरिष्ठ धर्मगुरु होते हैं, गुप्त मतदान के जरिए अगले ‘सुप्रीम लीडर’ का चुनाव करेगा।
अमेरिका और इजरायल के लिए असली चुनौती यह है कि ईरान का अगला नेता मोजतबा जैसा ‘कट्टरपंथी’ होगा या अराफी जैसा ‘सिस्टम का सिपाही’। शासन बदलना केवल एक नेता को मारना नहीं, बल्कि IRGC जैसी संस्थाओं के प्रभाव को खत्म करना है, जो फिलहाल असंभव सा लगता है।


