न्यायपालिका में भ्रष्टाचार को लेकर एनसीईआरटी (NCERT) की किताब में छपे विवादास्पद अंश पर सुप्रीम कोर्ट का रुख और कड़ा हो गया है। परिषद द्वारा मांगी गई बिना शर्त माफी को अपर्याप्त बताते हुए शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि यह मामला केवल शब्दों की गलती का नहीं, बल्कि देश की एक संवैधानिक संस्था की गरिमा को जानबूझकर ठेस पहुँचाने का है।
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि पाठ्यपुस्तकों के माध्यम से बच्चों के कोमल मन में न्यायपालिका के प्रति अविश्वास के बीज बोना एक गंभीर अपराध है।
- माफी पर रुख: अदालत ने कहा, “सिर्फ माफी मांग लेना काफी नहीं है। यह सामग्री एक दिन में तैयार नहीं हुई होगी। इसे विशेषज्ञों की कई समितियों ने देखा होगा। क्या किसी ने भी इस पर आपत्ति नहीं जताई?”
- संस्थागत गरिमा: बेंच ने टिप्पणी की कि आलोचना और बदनामी के बीच एक महीन रेखा होती है। शिक्षा का उद्देश्य संवैधानिक स्तंभों के प्रति सम्मान सिखाना है, न कि निराधार आरोपों के आधार पर उनकी छवि धूमिल करना।
अदालत के 3 कड़े निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की तह तक जाने के लिए निम्नलिखित निर्देश दिए हैं:
- जवाबदेही तय हो: अदालत ने एनसीईआरटी से उन लेखकों और समीक्षा समिति (Review Committee) के सदस्यों के नाम मांगे हैं, जिन्होंने इस विवादास्पद अध्याय को मंजूरी दी थी।
- प्रक्रिया की जांच: केंद्र सरकार और एनसीईआरटी को यह हलफनामा दायर करना होगा कि भविष्य में ऐसी सामग्री को रोकने के लिए उनके पास क्या ‘चेक और बैलेंस’ सिस्टम है।
- वितरण का विवरण: अदालत ने पूछा है कि अब तक इस किताब की कितनी प्रतियां बाजार में जा चुकी हैं और उन्हें वापस लेने (Recall) के लिए क्या कदम उठाए गए हैं।
क्या था विवाद?
एनसीईआरटी की कक्षा 8 की नई पुस्तक में न्यायपालिका के समक्ष चुनौतियों का वर्णन करते समय ‘भ्रष्टाचार’ को एक प्रमुख बिंदु के रूप में शामिल किया गया था। विशेषज्ञों का तर्क है कि बिना किसी ठोस डेटा या संदर्भ के स्कूली बच्चों को यह पढ़ाना न्यायिक निष्पक्षता पर सवाल उठाने जैसा है।
मामले की अगली सुनवाई अब दो सप्ताह बाद होगी, जिसमें एनसीईआरटी को अपना विस्तृत जवाब और दोषी अधिकारियों की सूची पेश करनी होगी।


