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    ‘शांति बोर्ड’ की बैठक में चीन-रूस को न्योता, ट्रंप का दावा-दुनिया का सबसे प्रभावशाली होगा

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक बड़ा दांव खेलते हुए ‘शांति बोर्ड’ (Board of Peace) की उद्घाटन बैठक में चीन और रूस को शामिल होने का खुला न्योता दिया है। 20 फरवरी 2026 को वॉशिंगटन डीसी में आयोजित इस बैठक में ट्रंप ने स्पष्ट किया कि वे वैश्विक संघर्षों के समाधान के लिए इन दो महाशक्तियों के साथ मिलकर काम करना चाहते हैं।

    यहाँ इस घटनाक्रम के मुख्य बिंदु और इसके संभावित प्रभाव दिए गए हैं:

    ‘शांति बोर्ड’ की पहली बैठक और ट्रंप का न्योता

    राष्ट्रपति ट्रंप ने घोषणा की कि वे चीन और रूस को बोर्ड का हिस्सा बनते हुए देखना “पसंद करेंगे”। उन्होंने साझा किया कि दोनों देशों को पहले ही आमंत्रित किया जा चुका है, हालांकि अभी तक उनकी ओर से औपचारिक पुष्टि नहीं हुई है।

    • मुलाकात और संबंध: ट्रंप ने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ अपने “बहुत अच्छे संबंधों” का जिक्र किया और बताया कि वे अप्रैल 2026 में चीन की यात्रा पर जा रहे हैं।
    • रणनीतिक उद्देश्य: विशेषज्ञों का मानना है कि रूस और चीन को शामिल करने का प्रस्ताव देकर ट्रंप एक नई वैश्विक व्यवस्था बनाना चाहते हैं जो पारंपरिक संयुक्त राष्ट्र (UN) के ढांचे से अलग हो।

    बोर्ड ऑफ पीस: UN का विकल्प या पूरक?

    ट्रंप ने इस बोर्ड को एक अत्यंत प्रभावशाली संस्था के रूप में पेश किया है। उनके बयानों से संकेत मिलता है कि यह बोर्ड भविष्य में संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को प्रभावित कर सकता है:

    • निगरानी की भूमिका: ट्रंप ने कहा कि ‘शांति बोर्ड’ संयुक्त राष्ट्र के कामकाज पर “नजर रखेगा” (looking over) ताकि वह ठीक से काम करे।
    • वित्तीय सहायता: उन्होंने UN को मजबूत बनाने और उसकी आर्थिक मदद करने का आश्वासन भी दिया, बशर्ते वह प्रभावी ढंग से काम करे।
    • भारी निवेश: ट्रंप ने शांति मिशन और विशेष रूप से गाजा पट्टी के पुनर्निर्माण के लिए अमेरिका की ओर से 10 अरब डॉलर के योगदान की घोषणा की है।

    दुनिया की राजनीति में क्यों मची हलचल?

    इस कदम को ‘ट्रंप का बड़ा जुआ’ माना जा रहा है क्योंकि:

    1. रूस-चीन धुरी: यदि रूस इस बोर्ड में शामिल होता है, तो वह चीन पर अपनी रणनीतिक निर्भरता कम कर सकता है और अमेरिका के साथ संबंधों को फिर से पटरी पर ला सकता है।
    2. बीजिंग की दुविधा: चीन के लिए इस बोर्ड से बाहर रहना हाशिए पर जाने जैसा होगा, लेकिन शामिल होने का मतलब होगा ट्रंप के नेतृत्व को स्वीकार करना और अपने ‘वीटो’ अधिकार वाले प्रभाव को खोना।
    3. गाजा पर फोकस: बोर्ड का तत्काल लक्ष्य गाजा में शांति स्थापित करना और उसे एक आधुनिक ‘रिविएरा’ के रूप में विकसित करना है।

    “शांति बोर्ड दुनिया का सबसे प्रभावशाली बोर्ड होगा, जो उन समस्याओं को सुलझाएगा जिन्हें UN दशकों से नहीं सुलझा पाया।” — डोनाल्ड ट्रंप

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