महाराष्ट्र के हर्ष गुप्ता की कहानी केवल एक प्रतियोगी परीक्षा पास करने की कहानी नहीं है, बल्कि यह उन लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा है जो संसाधनों की कमी को अपनी कमजोरी मानते हैं। कानपुर के रहने वाले हर्ष ने जो हासिल किया, वह किसी चमत्कार से कम नहीं लगता।
पिता के संघर्ष में बने भागीदार
हर्ष के पिता कल्याण में गोलगप्पे (पानीपूरी) का ठेला लगाते हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि हर्ष अक्सर स्कूल से आने के बाद अपने पिता के साथ ठेले पर खड़े होकर गोलगप्पे बेचते थे। जब दूसरे बच्चे कोचिंग और खेल-कूद में व्यस्त रहते थे, हर्ष उस समय ग्राहकों को पानीपूरी खिलाकर अपने पिता की मदद कर रहे होते थे।
11वीं में फेल होने का बड़ा झटका
हर्ष की शैक्षणिक यात्रा आसान नहीं थी। पढ़ाई और काम के बीच तालमेल बिठाने की कोशिश में वह 11वीं कक्षा में फेल हो गए। एक औसत छात्र के लिए यह किसी बड़े मानसिक आघात से कम नहीं था, लेकिन हर्ष ने इसे अपनी कमजोरी बनाने के बजाय खुद को परखने का जरिया बनाया। उन्होंने हार नहीं मानी और दोबारा पढ़ाई शुरू की।
दो बार पास की JEE परीक्षा
हर्ष का सपना बड़ा था। वह इंजीनियर बनना चाहते थे। उन्होंने अपनी दिनचर्या बदली और कड़ी मेहनत शुरू की। उनकी मेहनत का पहला फल तब मिला जब उन्होंने पहली बार JEE (Joint Entrance Examination) पास की। लेकिन वह अपनी रैंक से संतुष्ट नहीं थे और अपने सपनों के संस्थान—भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT)—पहुंचना चाहते थे।
हर्ष ने फिर से तैयारी की और दूसरी बार भी जेईई परीक्षा पास की। इस बार उनकी मेहनत रंग लाई और उन्हें देश के प्रतिष्ठित संस्थान IIT रुड़की (IIT Roorkee) में दाखिला मिला।
हर्ष की सफलता के प्रमुख सूत्र:
- कड़ी मेहनत (Resilience): दिन में काम करना और रात में पढ़ाई करना उनकी सफलता का आधार बना।
- असफलता को गले लगाना: 11वीं में फेल होने के बाद उन्होंने अपनी गलतियों से सीखा, न कि पढ़ाई छोड़ी।
- पारिवारिक समर्थन: मुश्किल आर्थिक स्थिति के बावजूद उनके पिता ने उनके सपनों पर भरोसा किया।
प्रेरणा का स्रोत
आज हर्ष गुप्ता IIT रुड़की में पढ़ाई कर रहे हैं और जल्द ही एक इंजीनियर के रूप में अपने परिवार की गरीबी दूर करेंगे। उनकी यह सफलता की कहानी सिखाती है कि “किस्मत बहाने नहीं, बल्कि मेहनत के मौके देती है।”


