एआईएमआईएम (AIMIM) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने एक बार फिर अपने विवादित और तीखे बयानों से देश की सियासत में हलचल पैदा कर दी है। एक जनसभा को संबोधित करते हुए ओवैसी ने मैसूर के शासक टीपू सुल्तान और हिंदुत्व विचारक वी.डी. सावरकर की तुलना करते हुए भारतीय जनता पार्टी (BJP) और आरएसएस (RSS) पर सीधा हमला बोला।
बयान के मुख्य बिंदु
ओवैसी ने इतिहास का हवाला देते हुए सावरकर की देशभक्ति पर सवाल उठाए और टीपू सुल्तान को असली स्वतंत्रता सेनानी बताया। ओवैसी ने कहा कि टीपू सुल्तान ने अंग्रेजों की गुलामी स्वीकार करने के बजाय युद्ध के मैदान में लड़ते हुए अपनी जान दे दी। वे एक सच्चे ‘शहीद’ थे जिन्होंने कभी फिरंगियों के सामने घुटने नहीं टेके।
- सावरकर पर निशाना साधते हुए ओवैसी ने कहा, “सावरकर ने अंग्रेजों को माफीनामे (Mercy Petitions) लिखे थे। वे अंग्रेजों को ‘लव लेटर’ लिखकर जेल से बाहर आने की गुहार लगा रहे थे, जबकि टीपू सुल्तान ने शहादत को चुना।”
- उन्होंने केंद्र सरकार पर आरोप लगाया कि वे इतिहास को अपनी सुविधानुसार बदलने की कोशिश कर रहे हैं और असली नायकों का अपमान कर रहे हैं।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं
भाजपा नेताओं ने ओवैसी के बयान की कड़ी निंदा करते हुए उन्हें ‘विभाजनकारी राजनीति’ का चेहरा बताया। भाजपा का तर्क है कि सावरकर एक महान क्रांतिकारी थे जिन्होंने काला पानी की सजा काटी, और ओवैसी केवल तुष्टीकरण के लिए इतिहास का अपमान कर रहे हैं।
- कई संगठनों ने सावरकर को ‘लव लेटर’ लिखने वाला कहे जाने पर आपत्ति जताई है और इसे करोड़ों लोगों की भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाला कृत्य बताया है।
ऐतिहासिक संदर्भ और विवाद
यह पहली बार नहीं है जब टीपू सुल्तान और सावरकर को लेकर विवाद हुआ है। कर्नाटक और महाराष्ट्र की राजनीति में ये दोनों नाम अक्सर ध्रुवीकरण का केंद्र रहे हैं। जहाँ एक पक्ष टीपू को ‘मैसूर का शेर’ मानता है, वहीं दूसरा पक्ष उन पर मंदिर तोड़ने और जबरन धर्मांतरण के आरोप लगाता है। इसी तरह, सावरकर के माफीनामों को उनके समर्थक ‘रणनीति’ बताते हैं, जबकि विरोधी इसे ‘कायरता’।


