बांग्लादेश में 12 फरवरी 2026 को होने वाले आम चुनाव न केवल ढाका, बल्कि नई दिल्ली के लिए भी रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। अगस्त 2024 में शेख हसीना के तख्तापलट के बाद यह पहला चुनाव है, जो दक्षिण एशिया की भू-राजनीति (Geopolitics) की दिशा तय करेगा। भारत के लिए यह चुनाव सुरक्षा, व्यापार और क्षेत्रीय स्थिरता के नजरिए से “मेक या ब्रेक” (Make or Break) की स्थिति जैसा है।
भारत के लिए क्यों है अहम?
- सुरक्षा और सीमा: भारत-बांग्लादेश की 4,096 किलोमीटर लंबी सीमा है। उत्तर-पूर्व (Northeast) राज्यों में उग्रवाद रोकने के लिए ढाका का सहयोग अनिवार्य है। अगर सत्ता में भारत-विरोधी ताकतें आती हैं, तो सिलीगुड़ी कॉरिडोर (Chicken’s Neck) की सुरक्षा पर खतरा बढ़ सकता है।
- आर्थिक हित: बांग्लादेश दक्षिण एशिया में भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है। द्विपक्षीय व्यापार करीब $15 अरब डॉलर का है। कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट्स और बिजली आपूर्ति जैसे महत्वपूर्ण सौदे नई सरकार की नीतियों पर टिके हैं।
- अल्पसंख्यकों की सुरक्षा: हाल के महीनों में बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ बढ़ी हिंसा भारत के लिए बड़ी चिंता का विषय रही है। भारत चाहता है कि एक ऐसी सरकार आए जो समावेशी हो।
नतीजों का संभावित प्रभाव
चुनाव मुख्य रूप से बीएनपी (BNP) और जमात-ए-इस्लामी के इर्द-गिर्द सिमटा है, क्योंकि अवामी लीग फिलहाल चुनावी दौड़ से बाहर है। यदि जमात-ए-इस्लामी जैसी कट्टरपंथी विचारधारा वाली पार्टियों का प्रभाव बढ़ता है, तो कट्टरपंथ के प्रसार और चीन-पाकिस्तान के बढ़ते दखल से भारत के हित प्रभावित हो सकते हैं। बांग्लादेश का चीन की ‘बेल्ट एंड रोड’ (BRI) की तरफ अधिक झुकाव भारत की घेराबंदी को बढ़ा सकता है।
प्रमुख पार्टियों का भारत के प्रति रुख
| पार्टी | भारत के प्रति रुख | मुख्य रणनीति |
| बीएनपी (BNP) | ऐतिहासिक रूप से सख्त, पर अब लचीला | तारिक रहमान के नेतृत्व में बीएनपी खुद को ‘समानता’ और ‘स्वतंत्रता’ के पैरोकार के रूप में पेश कर रही है। उसने भारत को “आका” नहीं बल्कि “दोस्त” मानने की बात कही है। |
| जमात-ए-इस्लामी | परंपरागत रूप से विरोधी | पहली बार जमात ने अपने घोषणापत्र में भारत के साथ ‘सम्मानजनक’ और ‘सहयोगात्मक’ रिश्तों का जिक्र किया है, हालांकि उनकी कट्टरपंथी छवि भारत को सशंकित रखती है। |
| एनसीपी (NCP) | छात्र नेताओं की नई पार्टी | यह पार्टी 2024 के विद्रोह की उपज है। इनका रुख अभी भी काफी राष्ट्रवादी और भारत की पिछली ‘हस्तक्षेप वाली नीतियों’ के खिलाफ रहा है। |
निष्कर्ष: भारत फिलहाल “वेट एंड वॉच” (रुको और देखो) की स्थिति में है। नई दिल्ली की प्राथमिकता यह है कि चुनाव निष्पक्ष हों और जो भी सत्ता में आए, वह भारत की सुरक्षा चिंताओं को नजरअंदाज न करे।


