अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नई रक्षा नीति ने वैश्विक भू-राजनीति में हलचल पैदा कर दी है। ट्रंप प्रशासन द्वारा जारी ‘नेशनल डिफेंस स्ट्रैटजी 2026’ (NDS) के 34 पन्नों के दस्तावेज़ में ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति को कड़ाई से लागू करने का रोडमैप पेश किया गया है।
नई नीति में चीन को एक बड़े दुश्मन के बजाय इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की एक ‘स्थापित शक्ति’ (Established Power) के रूप में देखा गया है।
- टकराव से बचाव: दस्तावेज़ में स्पष्ट किया गया है कि अमेरिका का लक्ष्य चीन को दबाना या अपमानित करना नहीं है, बल्कि केवल उसे अमेरिका या उसके सहयोगियों पर हावी होने से रोकना है।
- एशिया का ‘बॉस’: विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप प्रशासन ने परोक्ष रूप से चीन को एशिया का प्रभाव केंद्र मान लिया है। नीति में ‘ताइवान’ का कोई उल्लेख न होना बीजिंग के प्रति नरम रुख का संकेत माना जा रहा है।
सहयोगी देशों को झटका
ट्रंप ने उन देशों की कड़ी आलोचना की है जो दशकों से अपनी रक्षा के लिए अमेरिकी मदद पर निर्भर रहे हैं।
- मदद में कटौती: पेंटागन अब सहयोगी देशों को “सीमित समर्थन” प्रदान करेगा। ट्रंप ने साफ कर दिया है कि सहयोगियों को अब अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी खुद लेनी होगी और रक्षा बजट (जीडीपी का 5% तक) बढ़ाना होगा।
- यूरोप और NATO: यूरोपीय देशों को बड़ा झटका लगा है क्योंकि अमेरिका अब रूस को रोकने के लिए अपनी सेना का भारी निवेश करने के बजाय अपने घरेलू हितों और ‘पश्चिमी गोलार्ध’ (South America, Panama Canal, Greenland) पर ध्यान केंद्रित करेगा।
भारत के लिए क्या है इसमें?
भारत के दृष्टिकोण से यह रिपोर्ट चौंकाने वाली है क्योंकि इसमें ‘भारत’ का एक बार भी जिक्र नहीं किया गया है। पिछले प्रशासन (2017, 2022) में भारत को एक “प्रमुख रक्षा भागीदार” बताया गया था, लेकिन इस नई नीति में दक्षिण एशिया को नजरअंदाज करना नई दिल्ली के लिए चिंता का विषय हो सकता है।
इस नीति को ‘डॉनरो डॉक्ट्रिन’ (Donro Doctrine) का नाम दिया जा रहा है, जहाँ अमेरिका अपनी वैश्विक पुलिस की भूमिका को छोड़कर केवल अपने “ठोस हितों” की रक्षा पर केंद्रित हो रहा है।


