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    सोमनाथ मंदिर का इतिहास : भारत के प्रतिरोध और पुनरुत्थान की गाथा.. इन आक्रांताओं ने किया था हमला,

    सोमनाथ मंदिर न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि यह भारत के प्रतिरोध और पुनरुत्थान की जीवंत गाथा है। सोमनाथ मंदिर का इतिहास केवल एक धार्मिक स्थल की कहानी नहीं है, बल्कि यह विदेशी आक्रांताओं के विनाश और भारतीय संस्कृति के बार-बार पुनर्जीवित होने की महागाथा है। 11 जनवरी 2026 को ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ के अवसर पर इस मंदिर का इतिहास एक बार फिर चर्चा में है, विशेषकर महमूद गजनवी के हमले के 1000 वर्ष पूरे होने पर।

    सोमनाथ मंदिर का इतिहास

    सोमनाथ मंदिर का इतिहास केवल एक धार्मिक स्थल की कहानी नहीं है, बल्कि यह विदेशी आक्रांताओं के विनाश और भारतीय संस्कृति के बार-बार पुनर्जीवित होने की महागाथा है। इसे ‘प्रभास क्षेत्र’ के नाम से जाना जाता है और यह भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में प्रथम है।

    पौराणिक मान्यताएँ

    पुराणों के अनुसार, सोमनाथ मंदिर का निर्माण स्वयं चंद्रदेव (सोम) ने किया था। चंद्रमा को राजा दक्ष के श्राप से मुक्ति मिलने के बाद उन्होंने भगवान शिव की आराधना की और यहाँ सोने का मंदिर बनवाया। बाद में रावण ने इसे चाँदी का, भगवान कृष्ण ने लकड़ी का और राजा भीमदेव ने पत्थर का बनवाया।

    सोमनाथ मंदिर: विनाश और हमलों का इतिहास

    सोमनाथ मंदिर पर आक्रांताओं ने कई बार हमले किए, लेकिन हर बार यह और भी भव्य रूप में पुनर्जीवित हुआ।

    • महमूद गजनवी (1026 ईस्वी): सबसे विनाशकारी हमला 1026 में गजनवी द्वारा किया गया। उसने न केवल मंदिर को ध्वस्त किया और 2 करोड़ दीनार की संपत्ति लूटी, बल्कि मंदिर की रक्षा कर रहे हजारों भक्तों का कत्लेआम भी किया।
    • अलाउद्दीन खिलजी (1299 ईस्वी): खिलजी की सेना ने गुजरात आक्रमण के दौरान मंदिर को दोबारा निशाना बनाया और भारी लूटपाट की।
    • जफर खान (1395 ईस्वी): दिल्ली सल्तनत के गवर्नर जफर खान ने भी मंदिर को भारी नुकसान पहुँचाया।
    • औरंगजेब (1706 ईस्वी): अंतिम बड़ा हमला औरंगजेब के काल में हुआ। उसने मंदिर को पूरी तरह जमींदोज करने और वहां दोबारा पूजा न होने देने का आदेश दिया था।

    पुनर्निर्माण और नेहरू बनाम पटेल का विवाद

    स्वतंत्रता के बाद सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण आधुनिक भारत के इतिहास में एक वैचारिक संघर्ष का विषय रहा है। 12 नवंबर 1947 को जूनागढ़ की मुक्ति के बाद सरदार वल्लभभाई पटेल ने सोमनाथ के खंडहरों को देखकर इसके पुनर्निर्माण की शपथ ली। महात्मा गांधी ने सुझाव दिया कि मंदिर का निर्माण सरकारी धन के बजाय जनता के दान से होना चाहिए, जिसे स्वीकार कर लिया गया।

    जवाहरलाल नेहरू की आपत्ति

    देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित नेहरू मंदिर के पुनर्निर्माण और इसके उद्घाटन समारोह में सरकारी मशीनरी के शामिल होने के खिलाफ थे। नेहरू का मानना था कि एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में सरकार को किसी विशिष्ट धार्मिक स्थल के पुनर्निर्माण से नहीं जुड़ना चाहिए। हाल ही में बीजेपी ने दावा किया कि नेहरू ने 1950-51 के दौरान 17 पत्र लिखकर अपनी नाराजगी व्यक्त की थी। उन्होंने इस समारोह को “पंपस” (भव्य आडंबर) बताया और कहा कि इससे विदेशों में भारत की छवि खराब होगी।

    नेहरू नहीं चाहते थे कि तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद मंदिर के उद्घाटन में जाएं। उन्होंने इसे ‘हिंदू पुनरुत्थानवाद’ (Hindu Revivalism) के रूप में देखा।

    डॉ. राजेंद्र प्रसाद का स्टैंड

    नेहरू की आपत्ति के बावजूद डॉ. राजेंद्र प्रसाद 11 मई 1951 को उद्घाटन के लिए सोमनाथ गए। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत की धर्मनिरपेक्षता का अर्थ सभी धर्मों का सम्मान करना है, न कि धर्म से विमुख होना। उन्होंने वहां ज्योतिर्लिंग की स्थापना की।


    सोमनाथ मंदिर की कहानी विनाश की नहीं, बल्कि अटूट आस्था की है। पीएम मोदी के शब्दों में, “तलवारें कभी आस्था को नहीं मिटा सकीं।” आज सोमनाथ मंदिर अपनी भव्यता के साथ भारत के ‘सांस्कृतिक स्वाभिमान’ के प्रतीक के रूप में अडिग खड़ा है।

    विनाश के बीच पुनर्निर्माण का संकल्प

    जब-जब सोमनाथ की पवित्रता पर प्रहार हुआ, भारतीय राजाओं ने अपनी वीरता और संपत्ति इसे पुनर्जीवित करने में लगा दी।

    • राजा भीमदेव प्रथम (सोलंकी राजवंश): 1026 ईस्वी में महमूद गजनवी के हमले के तुरंत बाद, गुजरात के राजा भीमदेव प्रथम ने खंडित मंदिर के स्थान पर एक भव्य पत्थर के मंदिर का निर्माण शुरू कराया। उन्होंने गजनवी द्वारा फैलाई गई निराशा को खत्म कर विश्वास को पुनः स्थापित किया।
    • राजा कुमारपाल: 1169 ईस्वी में राजा कुमारपाल ने मंदिर का और अधिक विस्तार किया और इसे और भी उत्कृष्ट नक्काशी और पत्थरों से सजाया।
    • महारानी अहिल्याबाई होल्कर (1783 ई.): मुगलों और औरंगजेब के अत्याचारों के बाद जब मंदिर पूरी तरह से खंडहर हो चुका था, तब इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने मुख्य मंदिर से कुछ दूर ‘सोमनाथ महादेव’ का एक नया मंदिर बनवाया ताकि पूजा की परंपरा कभी न रुके।
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