अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड को खरीदने की अपनी पुरानी इच्छा को फिर से दोहराने और हालिया धमकियों के बाद, ग्रीनलैंड की संसद के सभी पांच प्रमुख राजनीतिक दलों ने एक दुर्लभ और कड़ा संयुक्त बयान जारी किया है। इन दलों ने दो टूक शब्दों में कहा है कि ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है और वे कभी भी अमेरिका का हिस्सा नहीं बनेंगे।
‘हम बिकाऊ नहीं हैं’ ग्रीनलैंड की संसद (Inatsisartut) में प्रतिनिधित्व करने वाले सभी पांचों दलों ने ट्रंप के बयानों को अपनी संप्रभुता का अपमान बताया है। संयुक्त बयान में कहा गया, “हम अमेरिकी नहीं बनेंगे। ग्रीनलैंड एक स्वतंत्र राष्ट्र बनने की दिशा में अग्रसर है और हमारी जमीन, हमारे संसाधन और हमारे लोग किसी भी कीमत पर बिकाऊ नहीं हैं।” यह प्रतिक्रिया ट्रंप के उस बयान के बाद आई है जिसमें उन्होंने संकेत दिया था कि यदि सुरक्षा चिंताओं को दूर नहीं किया गया, तो अमेरिका कड़े कदम उठा सकता है।
डेनमार्क को भी सुनाई खरी-खरी
दिलचस्प बात यह है कि ग्रीनलैंड के नेताओं ने केवल अमेरिका ही नहीं, बल्कि डेनमार्क को भी निशाने पर लिया है। ग्रीनलैंड वर्तमान में डेनमार्क के अधीन एक स्वायत्त क्षेत्र है। नेताओं ने कहा कि डेनमार्क को ग्रीनलैंड के भविष्य का फैसला अकेले करने का कोई हक नहीं है। उन्होंने मांग की कि डेनमार्क को ग्रीनलैंड की पूर्ण स्वतंत्रता की प्रक्रिया में तेजी लानी चाहिए ताकि बाहरी ताकतें इस तरह के दावे न कर सकें।
ट्रंप की नजर क्यों है ग्रीनलैंड पर?
- रणनीतिक स्थिति: आर्कटिक क्षेत्र में स्थित ग्रीनलैंड रूस और अमेरिका के बीच एक महत्वपूर्ण सैन्य केंद्र है।
- प्राकृतिक संसाधन: जलवायु परिवर्तन के कारण पिघलती बर्फ के नीचे कोयला, जस्ता, तांबा और लोहे जैसे खनिजों का विशाल भंडार मिलने की संभावना है।
- सुरक्षा चिंताएं: ट्रंप प्रशासन को डर है कि यदि अमेरिका ने ग्रीनलैंड पर नियंत्रण नहीं किया, तो चीन या रूस वहां अपना प्रभाव बढ़ा सकते हैं।
ग्रीनलैंड के इस कड़े रुख ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई बहस छेड़ दी है। जहां ट्रंप इसे ‘रियल एस्टेट डील’ की तरह देख रहे हैं, वहीं ग्रीनलैंड के लोगों ने साफ कर दिया है कि उनकी पहचान और आजादी किसी भी सौदे से ऊपर है।


