देशभर में आवारा कुत्तों के बढ़ते आतंक और उनके द्वारा किए जा रहे हमलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में 8 जनवरी 2026 को एक महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। इस दौरान न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने पशु प्रेमियों और प्रशासन के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करते हुए कई तीखी और रोचक टिप्पणियां कीं।
‘वैक्यूम इफेक्ट’ और चूहों का तर्क
सुनवाई के दौरान डॉग लवर्स की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सी.यू. सिंह ने दलील दी कि यदि संस्थागत क्षेत्रों (जैसे अस्पताल और स्कूल) से कुत्तों को अचानक हटा दिया जाता है, तो वहां ‘वैक्यूम इफेक्ट’ (Vacuum Effect) पैदा होगा। उन्होंने तर्क दिया कि कुत्ते चूहों और बंदरों की आबादी को नियंत्रित रखते हैं; यदि कुत्ते हटे, तो चूहों का आतंक बढ़ जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट की ‘बिल्ली’ वाली टिप्पणी
वकील के इस तर्क पर न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने मजाकिया लेकिन तार्किक अंदाज में सवाल किया, “क्या इसका आपस में कोई संबंध है? कुत्ते और बिल्लियां स्वाभाविक दुश्मन हैं और बिल्लियां चूहों को मारती हैं। तो क्या चूहों को नियंत्रित करने के लिए हमें ज्यादा बिल्लियों को बढ़ावा नहीं देना चाहिए? यही समाधान होगा।” अदालत ने आगे पूछा कि क्या वकील यह कहना चाहते हैं कि अस्पतालों के गलियारों में कुत्तों को घूमने की अनुमति दी जानी चाहिए?
सुनवाई के मुख्य बिंदु
- संस्थागत क्षेत्र ‘डॉग-फ्री’ हों: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसका पिछला आदेश केवल स्कूल, अस्पताल, सरकारी कार्यालयों और बस स्टैंड जैसे सार्वजनिक संस्थानों के लिए है, न कि हर गली के लिए।
- सड़क हादसों पर चिंता: पीठ ने कहा कि केवल डॉग बाइट ही समस्या नहीं है, बल्कि सड़कों पर आवारा पशुओं के कारण होने वाले हादसे भी जानलेवा हैं। कोर्ट ने बताया कि हाल ही में दो जज भी ऐसे ही हादसों का शिकार हुए हैं।
- एबीसी (ABC) नियमों का उल्लंघन: कोर्ट ने नाराजगी जताई कि राज्य और नगर निकाय Animal Birth Control Rules को ठीक से लागू नहीं कर रहे हैं। कई राज्यों ने अभी तक इस संबंध में हलफनामा भी दाखिल नहीं किया है।
- माइक्रो-चिपिंग का सुझाव: वरिष्ठ वकील नकुल दीवान ने बेंगलुरु का उदाहरण देते हुए कुत्तों की माइक्रो-चिपिंग का सुझाव दिया ताकि उनकी निगरानी की जा सके।


