भारत में इस साल मौसम का मिजाज बेहद असामान्य बना हुआ है। एक तरफ देश के 218 जिलों में हाल की बारिश के आधार पर सूखे जैसे हालात सामने आए हैं, तो दूसरी ओर 86 जिलों में अत्यधिक बारिश दर्ज की गई है। मौसम के इन दोनों छोरों ने चिंता बढ़ा दी है। भारतीय मौसम विभाग (IMD) के ताजा चार सप्ताह के Standardized Precipitation Index यानी SPI विश्लेषण में यह तस्वीर सामने आई है।
218 जिलों में सूखे जैसी स्थिति
IMD के 13 अगस्त से 9 सितंबर तक के चार सप्ताह के आंकड़ों के मुताबिक देश के 218 जिले मध्यम, गंभीर या अत्यधिक सूखी श्रेणी में हैं। ये संख्या 2023 के इसी तरह के अल नीनो वाले दौर से भी अधिक है। तब 188 जिलों में ऐसी स्थिति देखी गई थी। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि पूरे देश में सूखा पड़ गया है। SPI मुख्य रूप से हाल की बारिश की स्थिति को मापता है और तापमान, मिट्टी की नमी, भूजल या जलाशयों में पानी को सीधे शामिल नहीं करता।
आंकड़ों में खास चिंता इस बात को लेकर है कि हल्की सूखी स्थिति वाले जिलों की संख्या कम हुई है, जबकि मध्यम और गंभीर सूखे वाली श्रेणियों में बढ़ोतरी हुई है। मध्यम सूखे वाले जिले 2023 के 97 से बढ़कर इस साल 120 हो गए हैं, जबकि गंभीर सूखे वाले जिले 50 से बढ़कर 65 हो गए। अत्यधिक सूखे वाले जिलों की संख्या जरूर 41 से घटकर 33 हुई है।
दूसरी तरफ 86 जिलों में भारी बारिश
मौसम की दूसरी तस्वीर इससे बिल्कुल उलट है। देश के 86 जिले मध्यम से अत्यधिक गीली श्रेणी में पहुंच गए हैं। 2023 में ऐसे जिलों की संख्या केवल 58 थी। इस साल मध्यम रूप से अधिक बारिश वाले जिलों की संख्या 33 से बढ़कर 44, गंभीर रूप से अधिक बारिश वाले जिले 11 से बढ़कर 26 और अत्यधिक बारिश वाले जिले 14 से बढ़कर 16 हो गए हैं।
इसका मतलब यह है कि देश में बारिश समान रूप से नहीं हो रही। कुछ इलाकों में लंबे समय तक बारिश की कमी है, जबकि कुछ क्षेत्रों में कम समय में बहुत ज्यादा पानी गिर रहा है। इससे बाढ़, जलभराव और फसलों को नुकसान जैसी समस्याएं पैदा हो रही हैं।
अल नीनो से क्यों बढ़ी चिंता?
2026 में अल नीनो की स्थिति विकसित होने के कारण भारतीय मानसून पर इसके प्रभाव को लेकर पहले से चिंता जताई गई थी। केंद्र सरकार ने भी कमजोर मानसून की आशंका वाले करीब 315 जिलों की पहचान की थी। इनमें 111 जिलों को उच्च प्राथमिकता वाली श्रेणी में रखा गया था, जहां सिंचाई कवरेज 25 प्रतिशत से कम है और किसान मानसून पर ज्यादा निर्भर हैं।
अल नीनो का असर सिर्फ बारिश की कुल मात्रा पर नहीं, बल्कि उसके वितरण पर भी पड़ सकता है। लंबे सूखे अंतराल के बाद अचानक तेज बारिश होने से खेती के लिए स्थिति और जटिल हो जाती है। इससे बुवाई, फसल की वृद्धि, जल उपलब्धता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
खेती और पानी पर बढ़ेगा दबाव
मौसम विशेषज्ञों के मुताबिक मौजूदा SPI आंकड़े हाल के चार सप्ताह की तस्वीर दिखाते हैं। पूरे मानसून सीजन का असर इससे कहीं व्यापक हो सकता है। यदि किसी क्षेत्र में कई महीनों तक बारिश की कमी बनी रहती है, तो इसका असर कृषि और जल संसाधनों पर ज्यादा गंभीर हो सकता है।
इसलिए 218 जिलों में सूखे जैसे हालात और 86 जिलों में अत्यधिक बारिश की तस्वीर भारत के बदलते मानसूनी पैटर्न की ओर इशारा करती है। आने वाले दिनों में बारिश का वितरण, जल स्रोतों की स्थिति और फसलों पर इसका असर सबसे अहम मुद्दा रहेगा।


