नई दिल्ली में हो रहे ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दूसरे दिन शनिवार को वैश्विक अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय भुगतान व्यवस्था को लेकर अहम चर्चा होने की उम्मीद है। ब्रिक्स देशों के बीच सीमा-पार भुगतान को आसान बनाने और स्थानीय मुद्राओं में लेनदेन बढ़ाने की दिशा में ठोस पहल पर जोर है। हालांकि भारत की ओर से इसे सीधे तौर पर डॉलर के खिलाफ अभियान के रूप में पेश नहीं किया गया है।
भुगतान व्यवस्था पर क्यों है जोर?
ब्रिक्स के भीतर लंबे समय से ऐसी भुगतान व्यवस्था विकसित करने की चर्चा होती रही है, जिससे सदस्य देश अमेरिकी डॉलर और पश्चिमी वित्तीय ढांचे पर अपनी निर्भरता कम कर सकें। रूस पर पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद इस मुद्दे को और गति मिली है। प्रस्तावित व्यवस्था का उद्देश्य सदस्य देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में भुगतान और सीमा-पार लेनदेन को अधिक आसान बनाना है।
हालांकि भारत ने इस मुद्दे पर संतुलित रुख अपनाया है। नई दिल्ली की प्राथमिकता किसी एक मुद्रा को हटाना नहीं, बल्कि व्यापार और भुगतान के लिए अधिक विकल्प तैयार करना है। वित्तीय प्रणाली को लेकर ब्रिक्स के भीतर भी अलग-अलग विचार हैं, इसलिए किसी साझा व्यवस्था पर अंतिम सहमति बनना आसान नहीं होगा।
पीएम मोदी का नवाचार पर जोर
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ब्रिक्स बिजनेस फोरम में नवाचार, तकनीक और उद्यमिता को आर्थिक विकास का अहम आधार बताया। भारत की अध्यक्षता में इस साल ब्रिक्स के एजेंडे में लचीलेपन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता को प्रमुख स्थान दिया गया है। नई दिल्ली चाहती है कि ब्रिक्स केवल राजनीतिक बयान देने वाला मंच न रहे, बल्कि व्यापार, तकनीक, निवेश और वैश्विक विकास के लिए व्यावहारिक सहयोग का माध्यम बने।
भारत के लिए डिजिटल भुगतान और तकनीकी क्षमताएं इस एजेंडे का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ऐसे में भुगतान प्रणालियों के बीच बेहतर संपर्क और स्थानीय मुद्राओं में कारोबार बढ़ाने की पहल को भारत की डिजिटल क्षमता से भी जोड़कर देखा जा रहा है।
पुतिन ने पश्चिम को लेकर क्या कहा?
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने ब्रिक्स बिजनेस फोरम में पश्चिमी देशों पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि पश्चिमी प्रतिस्पर्धी अपनी पुरानी वैश्विक नेतृत्वकारी स्थिति हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं और इसके लिए प्रतिबंधों, व्यापारिक बाधाओं और अन्य दबावों का इस्तेमाल किया जा रहा है। पुतिन के मुताबिक, ऐसे कदम वैश्विक व्यापार और आर्थिक सहयोग को नुकसान पहुंचा रहे हैं।
पुतिन ने ब्रिक्स को वैश्विक विकास के लिए एक नई और टिकाऊ व्यवस्था तैयार करने में सक्षम मंच के तौर पर पेश किया। उन्होंने कहा कि उभरती अर्थव्यवस्थाओं को अपने हितों के अनुरूप स्वतंत्र आर्थिक सहयोग को मजबूत करना चाहिए।
भारत की रणनीति अलग
हालांकि पुतिन के बयान में पश्चिम के खिलाफ कड़ा रुख दिखाई दिया, भारत ब्रिक्स को सीधे तौर पर पश्चिम-विरोधी गठबंधन बनाने के पक्ष में नहीं है। नई दिल्ली का जोर बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था, आर्थिक सहयोग और ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूत करने पर है। भारत एक ओर रूस और चीन के साथ ब्रिक्स मंच पर काम कर रहा है, वहीं अमेरिका और यूरोपीय देशों के साथ भी उसके महत्वपूर्ण आर्थिक और रणनीतिक संबंध हैं।
ब्रिक्स के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि उसके सदस्य देशों के आर्थिक और रणनीतिक हित एक जैसे नहीं हैं। चीन, भारत, रूस, ईरान और अन्य सदस्य कई मुद्दों पर अलग-अलग रुख रखते हैं। इसलिए आज होने वाली चर्चा में भुगतान प्रणाली को लेकर सहमति कितनी ठोस बनती है, इस पर पूरी दुनिया की नजर रहेगी।


