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    हूती हमलों से बचाने नहीं आए पाकिस्तान-तुर्किये? सऊदी अरब हैरान, मक्का समझौते पर सवाल?

    सऊदी अरब पर यमन के हूती विद्रोहियों के लगातार हमलों ने हाल ही में बने मक्का संयुक्त रक्षा समझौते की असली परीक्षा शुरू कर दी है। समझौते में सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये ने एक-दूसरे की सुरक्षा को लेकर सहयोग का संकल्प लिया है। लेकिन जब हूतियों ने सऊदी के सैन्य ठिकानों और तेल से जुड़ी सुविधाओं को निशाना बनाया, तब पाकिस्तान और तुर्किये की ओर से सीधे सैन्य हस्तक्षेप देखने को नहीं मिला। इससे सवाल उठने लगा है कि क्या मक्का समझौता संकट की पहली बड़ी चुनौती में ही कमजोर पड़ गया है?

    आखिर क्या है मक्का समझौता?

    मक्का संयुक्त रक्षा समझौता अगस्त 2026 में सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के बीच हुआ था। इसका मकसद तीनों देशों के बीच रक्षा सहयोग और सामूहिक सुरक्षा को मजबूत करना है। यह समझौता पहले से मौजूद सऊदी-पाकिस्तान रक्षा व्यवस्था को विस्तार देता है और तुर्किये को भी इसमें शामिल करता है।

    समझौते की सबसे अहम बात यह है कि किसी सदस्य पर होने वाली आक्रामक कार्रवाई को सामूहिक सुरक्षा के नजरिए से देखा जा सकता है। इसी आधार पर पाकिस्तान ने हूतियों को चेतावनी देते हुए संकेत दिया है कि यदि संघर्ष सऊदी क्षेत्र में और बढ़ता है तो समझौते को सक्रिय किया जा सकता है।

    फिर पाकिस्तान सेना क्यों नहीं भेज रहा?

    सबसे बड़ा कारण यह है कि समझौते का मतलब हर हमले के बाद तुरंत दूसरे देश की धरती पर जाकर युद्ध करना नहीं है। पाकिस्तान ने साफ संकेत दिया है कि वह सऊदी क्षेत्र की रक्षा में मदद कर सकता है, लेकिन यमन में व्यापक युद्ध में सीधे उतरने से बचना चाहता है। पाकिस्तान के सामने घरेलू आर्थिक और सुरक्षा चुनौतियां भी हैं। इसके अलावा ईरान उसका पड़ोसी है और हूतियों के साथ ईरान के संबंधों के कारण सीधा सैन्य हस्तक्षेप क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ा सकता है।

    पाकिस्तान के लिए 2015 का यमन युद्ध भी एक अहम सबक है। उस समय उसकी संसद ने यमन संघर्ष में सैन्य रूप से शामिल नहीं होने का रुख अपनाया था। इसलिए मौजूदा संकट में भी इस्लामाबाद बेहद सावधानी से कदम बढ़ा रहा है।

    तुर्किये क्यों पीछे है?

    तुर्किये भी समझौते का हिस्सा है, लेकिन उसका शामिल होना तत्काल सैन्य अभियान में उतरने की गारंटी नहीं माना जा सकता। समझौते के तहत राजनीतिक और रक्षा समन्वय के लिए संस्थागत व्यवस्था बनाई गई है। अगस्त के अंत में तीनों देशों के रणनीतिक राजनीतिक एवं रक्षा समिति की बैठक भी हुई थी।

    क्या समझौता नाकाम हो गया?

    फिलहाल इसे नाकाम कहना जल्दबाजी होगी। हूती हमलों के बाद पाकिस्तान ने चेतावनी जारी की है और समझौते को सक्रिय करने की संभावना का संकेत दिया है। यानी व्यवस्था अभी कूटनीतिक और सुरक्षा दबाव के चरण में है।

    हालांकि, अगर सऊदी अरब पर हमले और बड़े होते हैं और इसके बावजूद पाकिस्तान-तुर्किये केवल बयान तक सीमित रहते हैं, तो मक्का समझौते की सामूहिक रक्षा प्रतिबद्धता पर गंभीर सवाल जरूर उठेंगे। अभी सबसे बड़ा सवाल यही है कि समझौता कागज पर बनी सुरक्षा गारंटी है या जरूरत पड़ने पर वास्तविक सैन्य ताकत में बदल सकता है।

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