India Mediation in Global Conflicts: दुनिया के कई हिस्सों में लंबे समय से जारी युद्ध और तनाव के बीच भारत की कूटनीतिक भूमिका पर एक बार फिर नजरें टिक गई हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध हो या पश्चिम एशिया में ईरान से जुड़ा संघर्ष, नई दिल्ली लगातार संवाद और कूटनीति को समाधान का रास्ता बता रही है। हालिया घटनाक्रमों ने यह सवाल भी खड़ा किया है कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन संघर्षों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभा सकते हैं?
रूस-यूक्रेन के बीच भारत की पहल
रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध को चार साल से ज्यादा समय हो चुका है। इस दौरान भारत ने किसी सैन्य गुट का हिस्सा बनने के बजाय दोनों पक्षों से संपर्क बनाए रखा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल में शंघाई सहयोग संगठन (SCO) सम्मेलन के दौरान रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मुलाकात की और युद्ध को खत्म करने की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि लगातार युद्ध मानवता को पीछे ले जाता है और अब अंतहीन युद्ध से आगे बढ़कर युद्ध की समाप्ति की दिशा में जाना चाहिए।
इसके बाद विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कीव में यूक्रेनी नेतृत्व के साथ बातचीत के दौरान कहा कि भारत युद्ध समाप्त करने में किसी भी तरह की मदद के लिए तैयार है। उन्होंने स्पष्ट किया कि संघर्ष का समाधान युद्ध के मैदान में नहीं, बल्कि संवाद और कूटनीति के जरिए निकलना चाहिए। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने भी भारत की इस प्रतिबद्धता का स्वागत किया।
ईरान को भी भारत से उम्मीद
पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव ने भी दुनिया की चिंता बढ़ा रखी है। इसी बीच ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के साथ प्रधानमंत्री मोदी की बातचीत में तनाव कम करने और संवाद के महत्व पर चर्चा हुई। भारत ने क्षेत्र में शांति के साथ-साथ व्यापार और समुद्री मार्गों की सुरक्षा को भी महत्वपूर्ण बताया है।
भारत की स्थिति इसलिए अलग है क्योंकि उसके रूस, ईरान और पश्चिमी देशों—तीनों के साथ अलग-अलग स्तर पर मजबूत संबंध हैं। यही वजह है कि कुछ विशेषज्ञ भारत को ऐसे संभावित पुल के रूप में देखते हैं, जो विरोधी पक्षों के बीच संवाद का रास्ता खोल सकता है। हालांकि संपर्क होना और प्रभावी मध्यस्थता कर पाना दो अलग बातें हैं।
रूस ने भी भारत की भूमिका को माना अहम
भारत की कूटनीतिक क्षमता को लेकर रूस की ओर से भी सकारात्मक संकेत मिले हैं। रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने कहा है कि ईरान और अमेरिका के बीच तत्काल संवाद में पाकिस्तान भूमिका निभा रहा है, लेकिन दीर्घकालिक क्षेत्रीय स्थिरता और मध्यस्थता में भारत योगदान दे सकता है। उन्होंने भारत के व्यापक कूटनीतिक अनुभव और अंतरराष्ट्रीय प्रभाव का उल्लेख किया।
क्या मोदी दुनिया की जंग रुकवा सकते हैं?
यह सवाल जितना बड़ा है, इसका जवाब उतना ही जटिल है। भारत के पास एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक फायदा है—वह रूस के साथ रणनीतिक संबंध रखता है, पश्चिमी देशों के साथ भी करीबी साझेदारी करता है और ईरान समेत पश्चिम एशिया के देशों से भी संवाद बनाए हुए है। इससे भारत के पास कई पक्षों तक पहुंच का अवसर है।
लेकिन युद्ध रोकने का अंतिम फैसला संबंधित देशों के राजनीतिक और रणनीतिक हितों पर निर्भर करता है। रूस और यूक्रेन के मामले में भी राष्ट्रपति पुतिन ने कहा है कि समाधान अंततः संघर्ष में शामिल देशों को ही निकालना होगा, भले ही दूसरे देश शांति प्रक्रिया में योगदान दें।
इसलिए फिलहाल भारत को ‘युद्ध रोकने वाला मध्यस्थ’ कहना जल्दबाजी होगी। हालांकि रूस, यूक्रेन और ईरान जैसे महत्वपूर्ण पक्षों से संवाद रखने वाला भारत शांति वार्ता के लिए भरोसेमंद चैनल जरूर बन सकता है। प्रधानमंत्री मोदी की लगातार ‘संवाद और कूटनीति’ पर जोर देने की नीति आने वाले समय में भारत की वैश्विक कूटनीतिक भूमिका को और मजबूत कर सकती है।


