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    UNSC अस्थाई सदस्यता की रेस, भारत-ताजिकिस्तान के बीच मुकाबला, इस्लामिक देश लामबंद

    संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के वर्ष 2028-29 के कार्यकाल के लिए अस्थाई सदस्यता की जंग काफी दिलचस्प और चुनौतीपूर्ण मोड़ पर पहुंच गई है। भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने हाल ही में ‘शांति’ (SHANTI: Securing Holistic Advancement through Norms, Trust, Integrity) के मूल मंत्र के साथ इस अभियान की आधिकारिक शुरुआत न्यूयॉर्क में की है।

    क्या है मुख्य मुकाबला?

    एशिया-प्रशांत समूह (Asia-Pacific Group) की एकमात्र अस्थाई सीट के लिए इस बार भारत और ताजिकिस्तान आमने-सामने खड़े हैं।

    • चुनाव की तारीख: यह अहम चुनाव जून 2027 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में होने जा रहे हैं।
    • जीत का गणित: संयुक्त राष्ट्र के कुल 193 सदस्य देशों में से जीत हासिल करने के लिए किसी भी उम्मीदवार को दो-तिहाई बहुमत (कम से कम 129 वोट) की आवश्यकता होगी।

    चुनौतियां और ताजिकिस्तान का पलड़ा

    ताजिकिस्तान को इस रेस में शुरुआत से ही एक बड़ी बढ़त मिलती दिख रही है, क्योंकि ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन (OIC) के 57 सदस्य देशों ने उसे अपना सामूहिक समर्थन देने का ऐलान किया है।

    • पाकिस्तान की भूमिका: इस कूटनीतिक घेरेबंदी में पाकिस्तान काफी सक्रिय है और ताजिकिस्तान का खुलकर समर्थन करते हुए भारत के खिलाफ इस्लामिक देशों को लामबंद करने की कोशिश में है।
    • जर्मनी की हार से सबक: विश्लेषक जर्मनी की हालिया चुनावी शिकस्त (पुर्तगाल और ऑस्ट्रिया के खिलाफ) का हवाला देते हुए भारत को सतर्क रहने की सलाह दे रहे हैं। यह दर्शाता है कि यूएनएससी के इन चुनावों में भारी भरकम कद के बावजूद किसी भी देश की जीत पहले से तय नहीं होती।

    भारत की जवाबी रणनीति और संभावनाएं

    कड़ी टक्कर के बावजूद भारत का कूटनीतिक नेटवर्क और ट्रैक रिकॉर्ड बेहद शानदार रहा है।

    • वैश्विक समर्थन: भारत को अब तक अमेरिका, श्रीलंका, ऑस्ट्रिया और फिजी जैसे रणनीतिक सहयोगियों का खुला समर्थन मिल चुका है।
    • खाड़ी देशों में सेंधमारी: विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने हाल के महीनों में कतर, बहरीन, कुवैत और ओमान जैसे महत्वपूर्ण खाड़ी देशों का दौरा किया है। रणनीतिकारों का मानना है कि संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे मित्र खाड़ी देश OIC के सामूहिक रुख से अलग होकर भारत के पक्ष में मतदान कर सकते हैं।
    • ग्लोबल साउथ की मजबूत आवाज: भारत इस चुनाव में विकासशील और अविकसित देशों (Global South) की सशक्त आवाज बनकर खुद को पेश कर रहा है।

    भारत अब तक रिकॉर्ड 8 बार सुरक्षा परिषद का अस्थाई सदस्य रह चुका है। हालांकि इस्लामिक देशों की लामबंदी से मुकाबला थोड़ा कठिन जरूर हुआ है, लेकिन यदि भारत लैटिन अमेरिकी, अफ्रीकी और कुछ प्रमुख खाड़ी देशों में अपनी पैठ मजबूत बनाए रखता है, तो वह आसानी से जीत के लिए जरूरी 129 वोटों का जादुई आंकड़ा हासिल कर सकता है।

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