25 जून 1975 का दिन भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में ‘काले अध्याय’ के रूप में दर्ज है। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सिफारिश पर राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने देश में आंतरिक अशांति का हवाला देते हुए आपातकाल (Emergency) की घोषणा की थी। 21 महीनों तक चले इस आपातकाल ने देश की राजनीतिक, सामाजिक और प्रशासनिक व्यवस्था को पूरी तरह झकझोर कर रख दिया था।
आपातकाल की पृष्ठभूमि: कैसे थे तब देश के हालात?
1975 में आपातकाल लागू होने से पहले देश के हालात बेहद तनावपूर्ण और अस्थिर थे। 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के कारण देश की अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव था। इसके साथ ही लगातार सूखे और वैश्विक तेल संकट ने महंगाई और बेरोजगारी को चरम पर पहुंचा दिया था। सरकार की नीतियों के खिलाफ देश भर में असंतोष था। गुजरात का नवनिर्माण आंदोलन और बिहार में जयप्रकाश नारायण (जेपी) के नेतृत्व में ‘संपूर्ण क्रांति’ का शंखनाद हो चुका था। 1974 में जॉर्ज फर्नांडिस के नेतृत्व में हुई ऐतिहासिक रेलवे हड़ताल ने चक्का जाम कर दिया था।
- न्यायपालिका से टकराव और इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला: इंदिरा गांधी की मुश्किलें तब सबसे ज्यादा बढ़ गईं जब 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उनके 1971 के रायबरेली चुनाव को अवैध घोषित कर दिया। कोर्ट ने उन पर सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग का दोषी पाते हुए 6 साल तक चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी थी।
24 घंटे पहले कैसे बनी आपातकाल की योजना?
हाई कोर्ट के फैसले के बाद विपक्ष ने इंदिरा गांधी के इस्तीफे के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया। 25 जून 1975 को दिल्ली के रामलीला मैदान में जयप्रकाश नारायण ने एक विशाल रैली की, जिसमें उन्होंने सेना और पुलिस से सरकार के असंवैधानिक आदेशों को न मानने की अपील की।
इस बढ़ते दबाव और अपनी सत्ता छिनने के डर से इंदिरा गांधी ने कड़ा कदम उठाने की योजना बनाई। 25 जून की रात को ही कैबिनेट की औपचारिक मंजूरी के बिना, सीधे राष्ट्रपति के पास आपातकाल के दस्तावेज भेजे गए। आधी रात को राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल के आदेश पर हस्ताक्षर कर दिए।
आपातकाल के बाद क्या हुआ?
- नेताओं की गिरफ्तारी: 25-26 जून की रात से ही जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मोरारजी देसाई और चरण सिंह समेत देश के तमाम बड़े विपक्षी नेताओं को सलाखों के पीछे डाल दिया गया।
- प्रेस पर सेंसरशिप: दिल्ली के बहादुर शाह जफर मार्ग पर स्थित अखबारों के दफ्तरों की बिजली काट दी गई ताकि सुबह अखबार न छप सकें। इसके बाद अखबारों पर सख्त सरकारी सेंसरशिप लागू कर दी गई।
- नागरिक अधिकारों का हनन: नागरिकों के मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए। पुलिस को बिना किसी वारंट या ट्रायल के किसी को भी हिरासत में लेने की असीमित शक्तियां (MISA के तहत) दे दी गईं।
अंधकार का यह दौर आखिरकार जनवरी 1977 में समाप्त हुआ, जब इंदिरा गांधी ने चुनावों की घोषणा की और मार्च 1977 में देश से आपातकाल पूरी तरह हटा लिया गया।


