महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना (यूबीटी) के भीतर मचे आंतरिक घमासान के बीच उद्धव ठाकरे गुट ने कानूनी और तकनीकी मोर्चा संभाल लिया है। अपने कई सांसदों के पाला बदलने और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात की अटकलों के बीच, उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) ने लोकसभा सचिवालय को एक बेहद महत्वपूर्ण और कड़ा पत्र भेजा है। इस पत्र के जरिए पार्टी ने लोकसभा अध्यक्ष से मांग की है कि यदि उनके गुट के सांसद बगावत करते हैं, तो उन्हें संसद में किसी भी अलग गुट के रूप में मान्यता न दी जाए।
पत्र के मुख्य बिंदु और कानूनी दलीलें
शिवसेना (यूबीटी) के वरिष्ठ नेता और संसदीय दल के नेता ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को लिखे पत्र में कानून की 10वीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून) का हवाला दिया है। पत्र में मुख्य रूप से निम्नलिखित बातें कही गई हैं:
- पार्टी की व्हिप और अनुशासन: सभी निर्वाचित सांसद शिवसेना (यूबीटी) के चुनाव चिन्ह और पार्टी व्हिप से बंधे हुए हैं। मूल पार्टी से अलग होकर किसी अन्य गुट को मान्यता देना लोकतांत्रिक मर्यादाओं के खिलाफ होगा।
- संविधान का हवाला: पत्र में स्पष्ट किया गया है कि केवल सांसदों की संख्या के आधार पर संसदीय दल को मूल राजनीतिक दल से अलग नहीं माना जा सकता। यदि कोई सांसद अलग होना चाहता है, तो उसे अपनी सदस्यता गंवानी होगी।
- अयोग्यता की चेतावनी: पार्टी ने चेतावनी दी है कि यदि कोई भी सांसद पार्टी लाइन से अलग जाकर किसी अन्य दल या गुट (जैसे शिंदे गुट) के साथ हाथ मिलाता है, तो पार्टी तुरंत उनकी लोकसभा सदस्यता रद्द करने के लिए अयोग्यता याचिका दाखिल करेगी।
बगावत की पृष्ठभूमि और ‘फंड’ की राजनीति
यह पत्र ऐसे समय में आया है जब उद्धव गुट के 9 लोकसभा सांसदों में से करीब 6 से 7 सांसदों के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली मूल शिवसेना में शामिल होने की खबरें तेज हैं।
संजय राउत का आरोप: “हमारे सांसदों को तोड़ने के लिए भारी भरकम प्रलोभन दिए जा रहे हैं। कुछ सांसदों को 15-15 करोड़ रुपये के एडवांस की पेशकश की गई है और उनके संसदीय क्षेत्रों के लिए बड़े विकास फंड का लालच दिया जा रहा है।”
इस संकट को देखते हुए उद्धव ठाकरे ने दिल्ली में पार्टी सांसदों की आपात बैठक बुलाई है। ठाकरे गुट का यह पत्र लोकसभा अध्यक्ष पर एक अग्रिम कानूनी दबाव बनाने की रणनीति है, ताकि 2022 में महाराष्ट्र विधानसभा के वक्त जैसी स्थिति (जब शिंदे गुट को असली शिवसेना मान लिया गया था) संसद में दोबारा न दोहराई जा सके। फिलहाल, लोकसभा सचिवालय की ओर से इस पत्र पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।


