जलवायु परिवर्तन के कारण भारत एक अभूतपूर्व संकट की ओर बढ़ रहा है। आमतौर पर मानसून आने के बाद लोगों को भीषण गर्मी से राहत मिलती है, लेकिन नए अध्ययनों से संकेत मिले हैं कि अब मानसून के मौसम में भी आधा भारत भीषण गर्मी और उमस की चपेट में रहेगा। तापमान और उमस का यह जानलेवा मेल देश की एक बड़ी आबादी के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकता है।
मुख्य बिंदु और संकट का पैमाना
- 70 करोड़ आबादी पर खतरा: रिपोर्ट के मुताबिक, इस बदलते मौसम चक्र का सीधा असर देश के लगभग 70 करोड़ लोगों पर पड़ेगा। इतनी बड़ी आबादी को मानसून के दौरान भी अत्यधिक गर्मी और असहनीय उमस का सामना करना पड़ सकता है।
- 53% हिस्सा प्रभावित: यदि वैश्विक तापमान (ग्लोबल वार्मिंग) में दो डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होती है, तो मानसून के दौरान देश का करीब 53 प्रतिशत भौगोलिक हिस्सा गंभीर रूप से गर्म और नम मौसम की चपेट में आ जाएगा।
- तापमान और उमस का घातक मेल: वैज्ञानिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, जब उच्च तापमान के साथ हवा में नमी (उमस) का स्तर बहुत बढ़ जाता है, तो मानव शरीर के लिए पसीना सुखाना और खुद को ठंडा रखना मुश्किल हो जाता है। इसे ‘वेट-बल्ब तापमान’ का बढ़ना भी कहा जाता है, जो स्वास्थ्य के लिहाज से बेहद जानलेवा साबित हो सकता है।
बदलाव के मुख्य कारण
यह खतरनाक बदलाव मुख्य रूप से अत्यधिक गर्म और नम मौसम की लगातार बढ़ती घटनाओं के कारण हो रहा है। कार्बन उत्सर्जन और पर्यावरण के साथ हो रही छेड़छाड़ ने वायुमंडल के संतुलन को बिगाड़ दिया है। मानसून की हवाएं अब सिर्फ बारिश नहीं ला रहीं, बल्कि समुद्र की गर्मी और नमी को भी साथ ला रही हैं, जिससे बारिश के अंतराल में ‘सफोकेशन’ (दमघोंटू उमस) का माहौल बन जाता है।
संभावित प्रभाव
- स्वास्थ्य संकट: हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन और दिल से जुड़ी बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ जाएगा। विशेष रूप से बुजुर्गों, बच्चों और बाहर काम करने वाले मजदूरों के लिए यह स्थिति सबसे अधिक जानलेवा होगी।
- आर्थिक नुकसान: अत्यधिक उमस और गर्मी के कारण श्रम उत्पादकता (काम करने की क्षमता) में भारी गिरावट आएगी। खेती-किसानी और निर्माण कार्यों से जुड़े लोगों का काम प्रभावित होगा।
- बिजली की मांग में रिकॉर्ड बढ़ोतरी: गर्मी से राहत पाने के लिए कूलिंग उपकरणों (एसी और पंखों) का इस्तेमाल बढ़ेगा, जिससे मानसून के महीनों में भी बिजली ग्रिड पर भारी दबाव रहेगा।
यह रिपोर्ट चेतावनी देती है कि यदि वैश्विक स्तर पर कार्बन उत्सर्जन को कम करने और स्थानीय स्तर पर हरियाली बढ़ाने के ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो राहत देने वाला मानसून भी आने वाले समय में एक बड़ी आपदा का रूप ले सकता है।


