पश्चिम एशिया (West Asia) में जारी सैन्य संघर्ष को समाप्त करने और वैश्विक अर्थव्यवस्था को बड़ी राहत देने के लिए अमेरिका और ईरान एक ऐतिहासिक शांति समझौते के बेहद करीब पहुंच गए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर पुष्टि की है कि दोनों देशों के बीच एक महत्वपूर्ण समझौता “काफी हद तक तय” (Largely Negotiated) हो चुका है और इसके अंतिम विवरणों पर चर्चा जारी है। इस संभावित समझौते (MOU) के मुख्य बिंदुओं में समुद्री मार्ग खोलने से लेकर परमाणु कार्यक्रम पर बड़े वादे शामिल हैं।
समझौते के प्रमुख स्तंभ और शर्तें
मीडिया रिपोर्ट्स (जैसे एक्सियोस और द न्यूयॉर्क टाइम्स) के अनुसार, इस शांति समझौते के मसौदे में कई महत्वपूर्ण और कड़े प्रावधान शामिल किए गए हैं, जो अगले 60 दिनों के संघर्ष विराम (Ceasefire Extension) के दौरान लागू होंगे:
- होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) का खुलना: ईरान इस रणनीतिक समुद्री मार्ग को व्यापारिक जहाजों के लिए पूरी तरह खोल देगा। इसके लिए वह वहां बिछाई गई बारूदी सुरंगों (Mines) को हटाएगा और जहाजों से कोई टैक्स (Toll) नहीं वसूला जाएगा।
- यूरेनियम का स्टॉक सौंपना: ईरान अपने ‘हाइली एनरिच्ड यूरेनियम’ (अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम) के भंडार को सौंपने या नष्ट करने पर सैद्धांतिक रूप से सहमत हो गया है। इसके अलावा, वह कभी भी परमाणु हथियार न बनाने की प्रतिबद्धता जताएगा।
- अमेरिकी प्रतिबंधों में ढील: इसके बदले में अमेरिका ईरान के बंदरगाहों की नाकेबंदी हटाएगा, उसे तेल बेचने की छूट (Sanctions Waivers) देगा और विदेशों में फ्रीज की गई ईरानी संपत्ति को चरणबद्ध तरीके से बहाल करेगा।
क्षेत्रीय सुरक्षा पर शर्त: इस समझौते में यह भी स्पष्ट किया गया है कि इजरायल और हिजबुल्लाह के बीच का संघर्ष भी थमेगा, बशर्ते हिजबुल्लाह की ओर से कोई उकसावे वाली कार्रवाई न हो।
वैश्विक तेल बाजारों में स्थिरता आएगी
जहां एक तरफ राष्ट्रपति ट्रंप इस सौदे को लेकर बेहद उत्साहित हैं और उन्होंने सऊदी अरब, यूएई, कतर और पाकिस्तान जैसे मध्यस्थ देशों के नेताओं के साथ फोन पर सफल चर्चा की है, वहीं ईरान के भीतर से मिश्रित संकेत मिल रहे हैं। ईरान की अर्ध-सरकारी समाचार एजेंसी ‘फार्स’ ने ट्रंप के दावों को वास्तविकता से परे बताते हुए कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य पर प्रबंधन और नियंत्रण ईरान का ही रहेगा और उसने अपने परमाणु कार्यक्रम को लेकर कोई भी अंतिम प्रतिबद्धता नहीं जताई है।
अमेरिकी सेना के अधिकारी इस बात पर नजर रखे हुए हैं कि यदि यह 60 दिनों का समझौता सफल रहता है, तो दोनों देशों के रिश्तों को पूरी तरह ‘रीसेट’ किया जा सकता है, जिससे वैश्विक तेल बाजारों में स्थिरता आएगी। हालांकि, इजरायल और अमेरिका के कुछ कट्टरपंथी रिपब्लिकन सांसद इस समझौते को लेकर अपनी चिंताएं भी व्यक्त कर रहे हैं।


