उत्तर और मध्य भारत में रिकॉर्ड तोड़ गर्मी और भीषण लू के बीच देश पर अब एक और बड़ा संकट मंडराने लगा है। केंद्रीय जल आयोग (CWC) की ताजा साप्ताहिक रिपोर्ट ने देश में पानी की उपलब्धता को लेकर गंभीर चिंताएं बढ़ा दी हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, भीषण गर्मी और प्री-मॉनसून बारिश की कमी के कारण देश के कई प्रमुख बांध पूरी तरह सूखने की कगार पर पहुंच गए हैं। वहीं, देश के 13 सबसे बड़े और महत्वपूर्ण जलाशयों में पानी का स्तर घटकर उनकी कुल क्षमता के आधे से भी कम रह गया है।
केंद्रीय जल आयोग (CWC) की रिपोर्ट के मुख्य बिंदु
केंद्रीय जल आयोग देश के मुख्य जलाशयों में पानी की लाइव स्टोरेज (उपयोगी पानी) की निगरानी करता है। इस हफ्ते जारी रिपोर्ट के चौंकाने वाले आंकड़े निम्नलिखित हैं:
- ऐतिहासिक गिरावट: देश के मुख्य 150 जलाशयों में पानी का कुल स्टॉक उनके सामान्य स्तर से काफी नीचे चला गया है।
- 13 बड़े जलाशयों की स्थिति गंभीर: महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों में स्थित 13 सबसे बड़े जलाशयों में पानी का स्तर 40% से 45% के बीच सिमट गया है।
- दक्षिण और मध्य भारत सबसे ज्यादा प्रभावित: दक्षिण भारत के राज्यों (विशेषकर चालू बेसिन और कृष्णा-कावेरी क्षेत्र) और मध्य भारत के बांधों में पानी का स्तर पिछले साल के मुकाबले बेहद कम दर्ज किया गया है।
जल संकट गहराने के प्रमुख कारण
भू-वैज्ञानिकों और जल प्रबंधन विशेषज्ञों के अनुसार, स्थिति के इतनी जल्दी गंभीर होने के पीछे तीन प्रमुख कारक जिम्मेदार हैं:
- भीषण गर्मी और वाष्पीकरण: मई के महीने में तापमान लगातार 45 डिग्री के पार जाने के कारण जलाशयों से पानी का वाष्पीकरण (Evaporation) बहुत तेजी से हो रहा है।
- कमजोर प्री-मॉनसून: मार्च से मई के बीच होने वाली प्री-मॉनसून बौछारें इस साल गायब रही हैं, जिससे नदियों और कैचमेंट एरिया में नया पानी नहीं आ सका।
- भूजल का अत्यधिक दोहन: बांधों में पानी कम होने के कारण ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में पानी की कमी को पूरा करने के लिए भूजल (Groundwater) का अनियंत्रित दोहन किया जा रहा है, जिससे वाटर टेबल लगातार नीचे गिर रहा है।
आम जनता, खेती और बिजली पर क्या होगा असर?
आने वाले दिन चुनौतीपूर्ण: यदि अगले कुछ हफ्तों में मॉनसून की एंट्री समय पर नहीं हुई, तो देश के कई बड़े शहरों में पीने के पानी की भारी किल्लत (Drinking Water Crisis) खड़ी हो सकती है।
इस जल संकट का सीधा असर तीन मुख्य मोर्चों पर देखने को मिलेगा:
- पीने के पानी की किल्लत: कई राज्यों के महानगरीय और ग्रामीण इलाकों में अभी से वाटर राशनिंग और टैंकरों के जरिए पानी की सप्लाई शुरू कर दी गई है।
- खेती को नुकसान: खरीफ फसलों की बुवाई के लिए किसानों को नहरों से मिलने वाले पानी में कटौती की जा सकती है, जिससे कृषि उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
- बिजली संकट का खतरा: देश के कई बड़े हाइड्रोपावर प्लांट (जल विद्युत परियोजनाएं) इन्हीं जलाशयों के पानी से चलते हैं। पानी का स्तर न्यूनतम स्तर (Dead Storage) के करीब पहुंचने से बिजली उत्पादन ठप होने का खतरा मंडरा रहा है, जो इस गर्मी में बिजली कटौती को और बढ़ा सकता है।


