भारत से मुकाबला करने और अपनी नौसैनिक क्षमता को बढ़ाने के लिए पाकिस्तान ने चीन के साथ मिलकर अत्याधुनिक हैंगोर-क्लास (Hangor-Class) पनडुब्बी बनाने का महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट शुरू किया था। हालांकि, बीजिंग के भारी-भरकम दावों और तकनीकी सहयोग के बावजूद, यह प्रोजेक्ट अब गंभीर तकनीकी और ढांचागत चुनौतियों के दलदल में फंस गया है। विशेष रूप से पाकिस्तान के कराची शिपयार्ड एंड इंजीनियरिंग वर्क्स (KSEW) में इस प्रोजेक्ट की प्रगति पर ब्रेक लग गया है।
कराची शिपयार्ड (KSEW) में क्यों फंसा पेंच?
साल 2015 में चीन और पाकिस्तान के बीच करीब 5 अरब डॉलर की लागत से 8 एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (AIP) तकनीक वाली डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों का सौदा हुआ था। समझौते के तहत 4 पनडुब्बियां चीन में और बाकी 4 पाकिस्तान के कराची शिपयार्ड (KSEW) में ‘टेक्नोलॉजी ट्रांसफर’ के जरिए बनाई जानी थीं। लेकिन अब कराची शिपयार्ड की पोल खुल चुकी है:
- शिपयार्ड की क्षमता का भ्रम: KSEW का रिकॉर्ड सामान्य युद्धपोत (Warships) बनाने में तो अच्छा रहा है, लेकिन सतह पर चलने वाले जहाज बनाने का अनुभव किसी शिपयार्ड को जटिल पनडुब्बी निर्माण में सक्षम नहीं बना देता। पनडुब्बी का निर्माण एक अत्यंत कठिन काम है, जिसमें अत्यधिक गहरे पानी का दबाव झेलने वाला मजबूत ढांचा, हाई-प्रिसीजन वेल्डिंग और सख्त गुणवत्ता परीक्षण की जरूरत होती है।
- प्रोजेक्ट में भारी देरी (Slippage): कराची में बनने वाली पनडुब्बियों का काम अपनी तय समयसीमा से कई साल पीछे चल रहा है। पाकिस्तान में बनने वाली पहली (प्रोजेक्ट की पांचवीं) पनडुब्बी के लिए स्टील कटिंग दिसंबर 2021 में हुई थी, जबकि छठी पनडुब्बी की नींव (Keel) बड़ी मुश्किल से फरवरी 2025 में रखी जा सकी।
- समयसीमा 2030 के पार: शुरुआती योजना के अनुसार सभी 8 पनडुब्बियों को 2028 तक नौसेना में शामिल होना था। लेकिन कराची शिपयार्ड की सुस्त रफ्तार के कारण अब इनके पूरी तरह तैयार होने में 2030 के दशक की शुरुआत तक का समय लग सकता है।
- अंतरराष्ट्रीय प्रमाणन और पारदर्शिता की कमी: पाकिस्तान ने KSEW की पनडुब्बी निर्माण क्षमता या उसकी गुणवत्ता को लेकर कोई भी स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय तकनीकी मूल्यांकन या सार्वजनिक प्रमाणन प्रस्तुत नहीं किया है, जिससे इसकी क्वालिटी पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। रक्षा विशेषज्ञों का तो यहां तक मानना है कि तकनीकी लाचारी के कारण अंततः चीनी इंजीनियरों को ही पाकिस्तान आकर ये पनडुब्बियां बनानी पड़ सकती हैं।
‘इंजन’ का बड़ा विवाद और चीनी प्रोपेगैंडा
कराची शिपयार्ड की नाकामी के अलावा इस पूरे प्रोजेक्ट की बुनियाद ही विवादों में रही है:
- जर्मनी का प्रतिबंध: ये पनडुब्बियां मूल रूप से विश्वस्तरीय जर्मन MTU 396 इंजन के लिए डिजाइन की गई थीं। लेकिन यूरोपीय संघ (EU) द्वारा चीन पर लगाए गए सैन्य हथियार प्रतिबंधों के उल्लंघन के कारण जर्मनी ने चीन को इन इंजनों की आपूर्ति ब्लॉक कर दी।
- अपुष्ट चीनी CHD620 इंजन: विकल्प के तौर पर चीन ने अपना घरेलू CHD620 इंजन पाकिस्तान को थमा दिया, जिसे पाकिस्तान ने बिना किसी स्वतंत्र तकनीकी जांच के मजबूरी में स्वीकार कर लिया। यह इंजन किसी भी अन्य स्थापित नौसेना द्वारा इस्तेमाल नहीं किया गया है और इसे शोर के मामले में जर्मन इंजन से बेहद कमजोर (Acoustically Inferior) माना जा रहा है।
भले ही चीन ने अप्रैल 2026 के अंत में अपनी धरती पर निर्मित पहली हैंगोर पनडुब्बी (PNS Hangor) पाकिस्तान को सौंपकर अपनी पीठ थपथपा ली हो, लेकिन ‘मेड इन पाकिस्तान’ का सपना कराची शिपयार्ड की तकनीकी विफलता, चीनी इंजनों की अविश्वसनीयता और बीजिंग पर पूरी तरह निर्भरता के कारण फिलहाल अधर में लटका नजर आ रहा है।


