भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को लेकर तनाव एक नए और गंभीर मोड़ पर पहुंच गया है। अप्रैल 2025 में हुए पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत द्वारा संधि को ‘निलंबित’ (Abeyance) करने के फैसले ने पाकिस्तान के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया है। विशेष रूप से 2026 की इन गर्मियों में पानी की कमी और जलवायु परिवर्तन ने स्थिति को और भयावह बना दिया है।
संधि का निलंबन और डेटा शेयरिंग पर रोक:
भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक पाकिस्तान आतंकवाद पर ठोस कार्रवाई नहीं करता, तब तक संधि निलंबित रहेगी। इसके तहत भारत ने पाकिस्तान के साथ हाइड्रोलॉजिकल डेटा (पानी के बहाव के आंकड़े) साझा करना बंद कर दिया है। बिना सटीक डेटा के, पाकिस्तान अपने बांधों और सिंचाई प्रणालियों का प्रबंधन नहीं कर पा रहा है।
गर्मियों में ‘सूखे’ का डर:
विशेषज्ञों के अनुसार, भारत गर्मियों के दौरान चिनाब और झेलम जैसी नदियों के पानी को अपने बांधों (जैसे बगलिहार और शाहपुर कंडी) में रोक सकता है। पाकिस्तान की भंडारण क्षमता केवल 30 दिनों की है, जिसका अर्थ है कि ऊपरी इलाकों में मामूली रुकावट भी पाकिस्तान के मैदानी इलाकों में अकाल जैसी स्थिति पैदा कर सकती है।
जलवायु परिवर्तन की दोहरी मार:
ग्लेशियरों के पिघलने की अनिश्चित दर और बारिश के बदलते पैटर्न ने सिंधु बेसिन के जल स्तर को अस्थिर कर दिया है। पाकिस्तान में कपास और गेहूं जैसी फसलों का उत्पादन पहले ही 20-30% गिर चुका है।
प्रमुख घटनाक्रम और बयान
- भारत का रुख: संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि ने हाल ही में (मार्च 2026) दोहराया कि भारत ने 60 साल तक धैर्य दिखाया, लेकिन अब “आतंकवाद और पानी की बातचीत एक साथ नहीं चल सकती।”
- पाकिस्तान की गुहार: पाकिस्तानी राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने इसे “पानी का युद्ध” (Water War) करार दिया है और विश्व बैंक से हस्तक्षेप की मांग की है। हालांकि, भारत इसे द्विपक्षीय मुद्दा मानकर किसी भी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता को खारिज कर चुका है।
- अंतरराष्ट्रीय चिंता: ‘ग्लोबल फोरम फॉर फूड एंड एग्रीकल्चर 2026’ में यह चेतावनी दी गई कि सिंधु बेसिन में जल संकट से दक्षिण एशिया की खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है।
डेटा की स्थिति (अनुमानित)
| कारक | प्रभाव / स्थिति |
| पाकिस्तान की जल भंडारण क्षमता | मात्र 30 दिन |
| कृषि पर निर्भरता | 80% सिंचाई सिंधु बेसिन पर आधारित |
| नदी प्रवाह में बदलाव | चिनाब नदी में 40% तक की कमी की शिकायत |
1960 में हुई यह संधि तीन युद्धों के बावजूद टिकी रही थी, लेकिन वर्तमान भू-राजनीतिक और पर्यावरणीय परिस्थितियों ने इसे इतिहास के सबसे कमजोर दौर में ला खड़ा किया है। यदि दोनों देशों के बीच ‘बैकडोर’ कूटनीति के जरिए जल-डेटा साझा करने पर सहमति नहीं बनी, तो आने वाले महीनों में पाकिस्तान के लाहौर जैसे शहरों में “केप टाउन जैसा जल संकट” देखने को मिल सकता है।


