इस्लामाबाद में हुई शांति वार्ता की विफलता के बाद अब अमेरिका और ईरान के बीच कूटनीतिक हलकों से बड़ी खबर आ रही है। दोनों देशों के बीच तनाव कम करने के लिए अगली महत्वपूर्ण बैठक स्विट्जरलैंड के जिनेवा (Geneva) में आयोजित की जा सकती है। होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ती सैन्य घेराबंदी और युद्ध के खतरों के बीच, यह कूटनीतिक प्रयास वैश्विक शांति के लिए बेहद अहम माना जा रहा है।
इस्लामाबाद वार्ता क्यों रही असफल?
पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में हुई बातचीत किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच सकी। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित रहे:
- कड़ी शर्तें: अमेरिका ने ईरान के सामने परमाणु कार्यक्रम को 20 साल तक फ्रीज करने और अंतरराष्ट्रीय निगरानी की शर्त रखी थी।
- प्रतिबंधों पर अड़चन: ईरान चाहता था कि बातचीत शुरू होने से पहले ही उन पर लगे कड़े आर्थिक प्रतिबंध हटा लिए जाएं, जिसे अमेरिका ने ठुकरा दिया।
- विश्वास की कमी: वार्ता के दौरान ही अमेरिका द्वारा होर्मुज में युद्धपोतों की तैनाती ने ईरान को असहज कर दिया, जिससे वार्ता बीच में ही लटक गई।
जिनेवा: शांति का नया केंद्र?
दावा किया जा रहा है कि दोनों पक्ष अब एक ‘न्यूट्रल ग्राउंड’ पर मिलने की तैयारी कर रहे हैं। जिनेवा ऐतिहासिक रूप से अंतरराष्ट्रीय विवादों को सुलझाने का केंद्र रहा है।
- यूरोपीय मध्यस्थता: जिनेवा में होने वाली इस बैठक में यूरोपीय संघ (EU) के प्रतिनिधि भी शामिल हो सकते हैं, जो अमेरिका और ईरान के बीच पुल का काम करेंगे।
- नया प्रस्ताव: सूत्रों का कहना है कि जिनेवा के लिए एक नया ‘ड्राफ्ट’ तैयार किया जा रहा है, जिसमें धीरे-धीरे प्रतिबंध हटाने और चरणबद्ध तरीके से परमाणु सीमाओं को लागू करने की बात हो सकती है।
- तैयारियां: दोनों देशों के वरिष्ठ राजनयिक और खुफिया अधिकारी जिनेवा में एजेंडा तय करने के लिए पर्दे के पीछे से काम कर रहे हैं।
होर्मुज संकट और कूटनीति का दबाव
एक तरफ जहां युद्ध की धमकियां दी जा रही हैं, वहीं दूसरी तरफ जिनेवा वार्ता की खबरों ने तेल बाजारों को थोड़ी राहत दी है।
- ट्रंप का रुख: राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने “मैक्सिमम प्रेशर” की नीति जारी रखी है, लेकिन वे यह भी संकेत दे चुके हैं कि वे एक ‘डील’ के लिए तैयार हैं।
- ईरान की मजबूरी: बंदरगाहों की नाकेबंदी से ईरान की अर्थव्यवस्था चरमरा रही है, जिससे वह वार्ता की मेज पर आने के लिए मजबूर हो सकता है।
यदि जिनेवा में होने वाली यह बैठक सफल रहती है, तो यह न केवल पश्चिम एशिया में युद्ध के बादलों को छांटेगी, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी स्थिरता देगी। दुनिया भर की नजरें अब इस पर टिकी हैं कि क्या जिनेवा वह चमत्कार कर पाएगा जो इस्लामाबाद नहीं कर सका।
वर्तमान में होर्मुज में तैनात 15 अमेरिकी युद्धपोत और F-35B फाइटर जेट्स इस कूटनीति के पीछे ‘शक्ति’ के रूप में खड़े हैं, जो ईरान को यह संदेश दे रहे हैं कि समझौते का रास्ता ही एकमात्र सुरक्षित विकल्प है।


