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    मानसून 2026: अल नीनो का रहेगा प्रभाव, सामान्य से कम बारिश का पूर्वानुमान

    अप्रैल 2026 के मध्य में भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) और विभिन्न वैश्विक मौसम एजेंसियों द्वारा जारी किए गए मानसून के शुरुआती पूर्वानुमानों ने देश की चिंता बढ़ा दी है। ताजा रिपोर्टों के अनुसार, इस वर्ष भारत में सामान्य से कम (Below Normal) बारिश होने के आसार हैं, जिसका सीधा असर आगामी खरीफ सीजन और देश की खाद्य सुरक्षा पर पड़ सकता है।


    प्रमुख पूर्वानुमान और मौसमी कारक

    मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, इस वर्ष मानसून के कमजोर रहने के पीछे कई तकनीकी और भौगोलिक कारण सक्रिय हैं:

    • अल नीनो (El Niño) का प्रभाव: प्रशांत महासागर में अल नीनो की स्थिति फिर से मजबूत हो रही है। ऐतिहासिक रूप से, जब भी अल नीनो सक्रिय होता है, भारत में मानसून की हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं और बारिश में कमी आती है।
    • हिंद महासागर द्विध्रुव (IOD): हिंद महासागर की परिस्थितियों ने भी फिलहाल कोई अनुकूल संकेत नहीं दिए हैं, जिससे मानसून के वितरण में असमानता और देरी की संभावना जताई जा रही है।
    • समय पूर्व गर्मी: मार्च और अप्रैल के शुरुआती महीनों में उत्तर और मध्य भारत में सामान्य से अधिक तापमान ने भूमि की नमी को कम कर दिया है, जो मानसून की शुरुआत के लिए एक चुनौती बन सकता है।

    कृषि और पैदावार पर संभावित प्रभाव

    भारत की लगभग 50% कृषि योग्य भूमि अभी भी सिंचाई के लिए पूरी तरह से मानसून पर निर्भर है। सामान्य से कम बारिश का अर्थ है:

    1. बुवाई में देरी: धान, मक्का, सोयाबीन और कपास जैसी महत्वपूर्ण खरीफ फसलों की बुवाई मुख्य रूप से जून-जुलाई की बारिश पर टिकी होती है। पानी की कमी से बुवाई का रकबा घट सकता है।
    2. उत्पादन में गिरावट: पर्याप्त बारिश न होने से फसलों की वृद्धि रुक जाती है, जिससे प्रति हेक्टेयर पैदावार में भारी कमी आ सकती है।
    3. लागत में वृद्धि: बारिश की कमी को पूरा करने के लिए किसानों को डीजल पंपों और कृत्रिम सिंचाई साधनों पर निर्भर होना पड़ेगा, जिससे खेती की लागत बढ़ जाएगी।

    आर्थिक और बाजार पर असर

    कम बारिश केवल खेतों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि इसका असर रसोई के बजट पर भी पड़ेगा:

    • खाद्य मुद्रास्फीति (Food Inflation): अनाज और तिलहन के उत्पादन में कमी से बाजार में दालों, चावल और तेल की कीमतों में उछाल आ सकता है।
    • ग्रामीण मांग में कमी: खेती से होने वाली आय घटने से ग्रामीण क्षेत्रों में मांग (जैसे ट्रैक्टर, मोटरसाइकिल और उपभोक्ता सामान) गिर सकती है, जो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा झटका होगा।
    • जल स्तर की कमी: मानसून की कमी से जलाशयों और भूजल स्तर में सुधार नहीं होगा, जिससे रबी (सर्दियों) की फसलों के लिए भी पानी की समस्या पैदा हो सकती है।

    किसानों के माथे पर चिंता की लकीरें

    सरकार और कृषि विभाग ने किसानों को कम पानी वाली फसलों और मोटे अनाज (Millets) की खेती को प्राथमिकता देने की सलाह दी है। साथ ही, सूक्ष्म सिंचाई (Micro-irrigation) और वर्षा जल संचयन पर जोर दिया जा रहा है। हालांकि, अंतिम स्थिति मानसून के केरल तट पर आगमन और उसके बाद के फैलाव पर निर्भर करेगी, लेकिन वर्तमान पूर्वानुमानों ने नीति निर्माताओं और किसानों दोनों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं।

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