ईरान और अमेरिका के बीच तनाव चरम पर है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिकी प्रशासन ने ईरान के बंदरगाहों की पूर्ण नाकेबंदी (Blockade) शुरू कर दी है। इस सैन्य घेराबंदी का मुख्य उद्देश्य ईरान की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ना और उसे इस्लामाबाद में चल रही शांति वार्ता में झुकने पर मजबूर करना है।
सैन्य शक्ति और युद्धपोत
अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने ईरान के खिलाफ ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ के तहत भारी सैन्य जमावड़ा किया है।
- 15 से अधिक युद्धपोत: अमेरिकी नौसेना ने होर्मुज क्षेत्र में 15 से अधिक अत्याधुनिक युद्धपोतों को तैनात किया है। इनमें डिस्ट्रॉयर (Destroyers) और एम्फीबियस असॉल्ट शिप शामिल हैं।
- F-35B लाइटनिंग II फाइटर जेट: इन युद्धपोतों पर पांचवीं पीढ़ी के घातक F-35B लड़ाकू विमान तैनात हैं, जो गुप्त तरीके (Stealth) से हमला करने में सक्षम हैं।
- रणनीतिक तैनाती: अमेरिका ने स्पष्ट किया है कि यह नाकेबंदी केवल ईरानी बंदरगाहों के लिए है। अन्य देशों के जहाजों को होर्मुज से गुजरने की अनुमति है, लेकिन उन पर कड़ी निगरानी रखी जा रही है।
तनाव का मुख्य कारण
- शांति वार्ता की विफलता: पाकिस्तान के इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच चल रही सीधी बातचीत में कोई समझौता नहीं हो सका। अमेरिका ने ईरान के सामने 20 साल तक यूरेनियम संवर्धन रोकने और होर्मुज में निर्बाध आवाजाही की शर्तें रखी थीं, जिन्हें ईरान ने ठुकरा दिया।
- ट्रंप की चेतावनी: राष्ट्रपति ट्रंप ने सोशल मीडिया पर स्पष्ट किया है कि यदि ईरान की कोई भी ‘फास्ट अटैक बोट’ अमेरिकी घेराबंदी के करीब आई, तो उसे तुरंत नष्ट कर दिया जाएगा।
वैश्विक प्रभाव
होर्मुज दुनिया के 20% तेल व्यापार का मार्ग है। इस नाकेबंदी के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Brent Crude) की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार निकल गई हैं। ईरान ने भी जवाबी धमकी देते हुए कहा है कि वह क्षेत्र के किसी भी बंदरगाह को सुरक्षित नहीं रहने देगा।
वर्तमान स्थिति ने पश्चिम एशिया को एक बड़े युद्ध के मुहाने पर खड़ा कर दिया है, जहां अमेरिका अपनी हवाई और समुद्री ताकत के जरिए ईरान पर “मैक्सिमम प्रेशर” बना रहा है।


