हिमाचल प्रदेश की आर्थिक स्थिति को लेकर एक चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। राज्य सरकार पर कर्ज का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है और अब यह 1 लाख करोड़ रुपये के मनोवैज्ञानिक आंकड़े को पार कर चुका है।
हिमाचल प्रदेश वर्तमान में एक “ऋण जाल” (Debt Trap) की स्थिति की ओर बढ़ रहा है, जहाँ पुराने कर्ज को चुकाने के लिए नया कर्ज लेना मजबूरी बन गया है। यदि राजस्व प्राप्ति के नए स्रोत जल्द नहीं खोजे गए, तो आने वाले समय में राज्य की अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में फंस सकती है।
कर्ज का बढ़ता पहाड़: मुख्य आंकड़े
- कुल कर्ज: 31 जनवरी 2026 तक हिमाचल प्रदेश पर कुल बकाया कर्ज 1,01,863 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है।
- 12 महीने में 13 बार लोन: सरकार की वित्तीय मजबूरी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले 12 महीनों के भीतर सरकार को 13 बार बाजार से कर्ज उठाना पड़ा है।
- ब्याज का बोझ: राज्य सरकार को केवल कर्ज का ब्याज चुकाने के लिए ही भारी भरकम राशि खर्च करनी पड़ रही है। अनुमान है कि वित्त वर्ष 2026-27 में ब्याज अदायगी पर 7,272 करोड़ रुपये खर्च होंगे।
खर्च और आमदनी का असंतुलन
कैग (CAG) की रिपोर्ट और विधानसभा में पेश किए गए आंकड़ों के अनुसार, राज्य की कमाई का एक बड़ा हिस्सा निश्चित खर्चों में चला जाता है।
- वेतन और पेंशन: राज्य के राजस्व का लगभग 60-70% हिस्सा कर्मचारियों के वेतन और पेंशनरों की पेंशन चुकाने में खर्च हो रहा है।
- कर्ज अदायगी: पिछले तीन वर्षों में सरकार ने कर्ज और ब्याज चुकाने पर 26,256 करोड़ रुपये खर्च किए हैं।
- विकास कार्य: भारी कर्ज के कारण नए विकास कार्यों और बुनियादी ढांचे (Infrastructure) के लिए फंड की कमी का सामना करना पड़ रहा है।
निगमों और बोर्डों की खराब स्थिति
केवल सरकार ही नहीं, बल्कि राज्य के प्रमुख बोर्ड और निगम भी घाटे में डूबे हुए हैं:
- बिजली बोर्ड: ₹3390.77 करोड़ का घाटा।
- परिवहन निगम (HRTC): ₹2272.24 करोड़ का घाटा।
- पॉवर कॉरपोरेशन: ₹976.03 करोड़ का घाटा।
सरकार का पक्ष और कदम
मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने सदन में जानकारी दी कि सरकार राजस्व बढ़ाने के लिए कड़े कदम उठा रही है:
- नए उपकर (Cess): दूध पर सेस, बिजली की खपत पर पर्यावरण/ग्रीन सेस और खनन पर नए टैक्स लगाए गए हैं।
- संसाधनों का दोहन: शराब के ठेकों की नीलामी और अन्य कर सुधारों के जरिए खजाना भरने की कोशिश की जा रही है।


