दुनिया इस समय 1970 के दशक के तेल संकट (Oil Shock) से भी भीषण ऊर्जा संकट की कगार पर खड़ी है। ओमान और ईरान के बीच स्थित होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) पिछले एक महीने से पूरी तरह बंद है, जिसने वैश्विक अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है।
होर्मुज: दुनिया की ऊर्जा लाइफलाइन ठप
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण ‘चोक पॉइंट’ है। सामान्य दिनों में यहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 20-25% हिस्सा गुजरता है। ईरान-अमेरिका युद्ध के चलते इस रास्ते से एक महीने से जहाजों की आवाजाही बंद है।
- सप्लाई चेन टूटी: सऊदी अरब, इराक, यूएई और कुवैत जैसे बड़े तेल उत्पादकों का निर्यात मार्ग अवरुद्ध हो गया है। इसके साथ ही कतर से होने वाली एलएनजी (LNG) की सप्लाई रुकने से यूरोप और एशिया में बिजली संकट गहरा गया है।
1970 के दशक से भी भयानक स्थिति?
विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान संकट 1973 के अरब-इजरायल युद्ध के समय आए तेल संकट से कहीं अधिक घातक है।
- वैश्विक निर्भरता: 70 के दशक की तुलना में आज की दुनिया ऊर्जा और जटिल ग्लोबल सप्लाई चेन पर कहीं अधिक निर्भर है।
- कीमतों में रिकॉर्ड उछाल: अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं। भारत जैसे आयात पर निर्भर देशों के लिए यह स्थिति दोहरी मार जैसी है—एक तरफ परिवहन महंगा हो रहा है, तो दूसरी तरफ विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ रहा है।
वैश्विक अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
होर्मुज के बंद होने का असर केवल तेल तक सीमित नहीं है:
- शिपिंग और रसद: मालवाहक जहाजों को अब अफ्रीका के ‘केप ऑफ गुड होप’ से होकर लंबा रास्ता तय करना पड़ रहा है, जिससे माल ढुलाई का समय और लागत 30-40% बढ़ गई है।
- खाद्य सुरक्षा: ईंधन महंगा होने से खेती और परिवहन की लागत बढ़ गई है, जिससे दुनिया भर में अनाज और आवश्यक वस्तुओं की कीमतें बढ़ रही हैं।
- औद्योगिक उत्पादन: ऊर्जा की कमी के कारण यूरोप और एशिया के कई विनिर्माण प्लांट बंद होने की कगार पर हैं।
आगे की राह और भारत की स्थिति
भारत अपनी तेल जरूरतों का 80% से अधिक आयात करता है। सरकार इस संकट से निपटने के लिए रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (Strategic Petroleum Reserves) का उपयोग कर रही है और वैकल्पिक मार्गों की तलाश में है।
हालांकि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में 2-3 हफ्तों में वापसी के संकेत दिए हैं, लेकिन होर्मुज को फिर से सुरक्षित बनाने और तेल की कीमतों को स्थिर करने में महीनों का समय लग सकता है। अगर यह रास्ता जल्द नहीं खुला, तो दुनिया को एक दीर्घकालिक आर्थिक मंदी (Recession) का सामना करना पड़ सकता है।


