चित्तौड़गढ़, राजस्थान के ऐतिहासिक दुर्ग में आयोजित एक भव्य कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने महारानी पद्मिनी (पद्मावती) के त्याग और बलिदान को नमन करते हुए देश को एक सशक्त संदेश दिया। मुख्यमंत्री ने इस ऐतिहासिक स्थल को ‘त्याग और बलिदान की परिपाटी’ का प्रतीक बताते हुए कहा कि यह दुर्ग हमें नारी अस्मिता की रक्षा के लिए प्रेरित करता है।
इतिहास से प्रेरणा और महिला सुरक्षा पर जोर
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि चित्तौड़गढ़ का यह दुर्ग केवल पत्थरों की इमारत नहीं, बल्कि हमारे गौरवशाली अतीत का जीवंत प्रमाण है। उन्होंने महारानी पद्मिनी (पद्मावती) के जौहर को याद करते हुए कहा, “आज का यह समारोह हमें यह संकल्प लेने की प्रेरणा देता है कि भविष्य में किसी भी बेटी या बहन को उस भयावह दौर से न गुजरना पड़े। महिला सुरक्षा और सम्मान आज हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।”
विधर्मियों को चेतावनी और स्वाभिमान का संदेश
इतिहास के पन्नों को पलटते हुए योगी आदित्यनाथ ने महाराणा रतन सिंह की वीरगति और महारानी पद्मिनी के नेतृत्व में हजारों वीरांगनाओं द्वारा किए गए जौहर की गाथा का उल्लेख किया। उन्होंने कहा, उस समय जब विधर्मियों द्वारा आक्रमण किया गया, तो महारानी पद्मिनी ने अपनी अस्मिता और मातृभूमि की मर्यादा बचाने के लिए जौहर का कठिन मार्ग चुना। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि यह बलिदान हमें यह सिखाता है कि किसी भी विधर्मी को भारत माता की पवित्र भूमि पर टिकने नहीं दिया जाएगा।
एकता और राष्ट्रवाद की आवश्यकता
उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत का इतिहास वीरांगनाओं के जौहर और वीरों की वीरता से रंगा है। उन्होंने जनता से आह्वान किया कि हमें अपने इतिहास से सीख लेकर वर्तमान चुनौतियों का सामना करना चाहिए। मुख्यमंत्री ने राष्ट्रवाद की भावना को सर्वोपरि रखने पर बल दिया और कहा कि जब भी देश के गौरव पर संकट आएगा, पूरा भारत एक होकर उसका सामना करेगा। यह कार्यक्रम न केवल महारानी पद्मिनी को श्रद्धांजलि देने का एक अवसर था, बल्कि वर्तमान पीढ़ी को राष्ट्र के प्रति उनके कर्तव्यों और महिलाओं के सम्मान के प्रति जागरूक करने का एक मंच भी बना।
चित्तौड़गढ़ का किला न केवल राजस्थान का, बल्कि पूरे भारत के राजपूत शौर्य, त्याग और बलिदान का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है। अरावली पर्वतमाला की एक पहाड़ी पर स्थित यह विशाल दुर्ग लगभग 700 एकड़ में फैला हुआ है।
चित्तौड़गढ़ के किले का इतिहास
इसका इतिहास 7वीं शताब्दी से जुड़ा है। माना जाता है कि इसे मौर्य शासक चित्रांगद मौर्य ने बनवाया था और उनके नाम पर ही इसे ‘चित्तौड़’ कहा गया। बाद में यह मेवाड़ के सिसोदिया राजवंश (गुहिल वंश) की राजधानी बना। महान राजा बप्पा रावल ने इसे 8वीं सदी में अपने नियंत्रण में लिया था।
तीन महान ‘साके’ (जौहर और युद्ध)
चित्तौड़गढ़ का किला तीन प्रमुख घेराबंदियों के लिए विश्व प्रसिद्ध है, जहाँ वीरांगनाओं ने जौहर किया और वीरों ने केसरिया बाना पहनकर युद्ध लड़ा:
- प्रथम साका (1303 ई.): यह सबसे चर्चित युद्ध है, जिसमें अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया। महारानी पद्मिनी (पद्मावती) के नेतृत्व में हजारों राजपूत महिलाओं ने अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए ‘जौहर’ किया था।
- द्वितीय साका (1535 ई.): गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह के आक्रमण के दौरान रानी कर्णावती ने जौहर का नेतृत्व किया था। उस समय रानी ने मुगल बादशाह हुमायूं को राखी भेजी थी, हालांकि उनकी सहायता समय पर नहीं पहुंच पाई थी।
- तृतीय साका (1567-68 ई.): मुगल बादशाह अकबर के आक्रमण के दौरान महाराणा उदयसिंह किले से सुरक्षित निकल गए थे, लेकिन जयमल और फत्ता ने अपनी वीरता के साथ किले की रक्षा की। अंत में उनकी पत्नियों ने जौहर किया।
किले की प्रमुख संरचनाएं
- विजय स्तंभ (Vijay Stambh): इसे महाराणा कुंभा ने मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी पर विजय के उपलक्ष्य में बनवाया था। यह 9 मंजिला मीनार चित्तौड़ की शान है।
- कीर्ति स्तंभ (Kirti Stambh): यह जैन धर्म को समर्पित है और इसे 12वीं शताब्दी में बनाया गया था।
- पद्मिनी महल: यह वही स्थान है जहाँ से महारानी पद्मिनी (पद्मावती) ने रानी के कक्ष से जल में प्रतिबिंबित दर्पण के माध्यम से खिलजी को अपना चेहरा दिखाया था।
4. विरासत
- यूनेस्को विश्व धरोहर: अपनी अनूठी स्थापत्य कला और ऐतिहासिक महत्व के कारण इसे यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया है।
- वीरों की भूमि: यह किला मीराबाई की भक्ति और महाराणा प्रताप के संघर्ष की भी प्रेरणा स्थली रहा है।
चित्तौड़गढ़ का किला आज केवल एक पर्यटन स्थल नहीं है, बल्कि यह उन लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत है जो स्वाभिमान और राष्ट्र रक्षा को जीवन का आधार मानते हैं।


