इजरायल, अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे भीषण संघर्ष के कारण दक्षिण एशिया के देशों में ईंधन (तेल और डीजल) का गहरा संकट पैदा हो गया है। इस तनाव ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को बाधित कर दिया है, जिसके चलते भारत के पड़ोसी देश भारी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।
बांग्लादेश को भारत की मदद
ईंधन की भारी किल्लत से जूझ रहे बांग्लादेश के लिए भारत एक मददगार के रूप में सामने आया है। भारत ने एक समझौते के तहत बांग्लादेश को पाइपलाइन के जरिए 5,000 टन डीजल की आपूर्ति की है। यह खेप पारबतीपुर सीमा के माध्यम से वहां पहुंचाई गई है। युद्ध के कारण पैदा हुए वैश्विक तेल संकट से बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ा था। इस आपूर्ति से वहां ईंधन की उपलब्धता बनाए रखने में काफी मदद मिलने की उम्मीद है। यह भारत की ‘नेबरहुड फर्स्ट’ नीति का एक हिस्सा है।
अन्य पड़ोसी देशों का हाल
क्षेत्र के अन्य देशों की स्थिति भी चिंताजनक बनी हुई है:
- पाकिस्तान: पाकिस्तान पहले से ही आर्थिक और आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों (जैसे टीटीपी और बलूच लड़ाके) से घिरा हुआ है। ईरान-इजरायल युद्ध ने उसकी स्थिति को और अधिक नाजुक बना दिया है। पाकिस्तान इस संघर्ष में किसी भी तरफ से सीधे जुड़ने से बच रहा है, लेकिन क्षेत्र में अस्थिरता का सीधा असर उसके ऊर्जा आयात और अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है।
- श्रीलंका: श्रीलंका की स्थिति भी संवेदनशील है। हाल ही में श्रीलंका द्वारा एक ईरानी जहाज को अपने बंदरगाह पर शरण देने का निर्णय चर्चा में रहा, जो अमेरिका और इजरायल के साथ उसके कूटनीतिक संबंधों को प्रभावित कर सकता है। वहां भी ईंधन और आर्थिक स्थिरता के मोर्चे पर कड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
वैश्विक और क्षेत्रीय प्रभाव
यह संघर्ष केवल सैन्य नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से भी विनाशकारी है:
- हॉर्मुज जलडमरूमध्य: इस महत्वपूर्ण मार्ग के प्रभावित होने से तेल की वैश्विक आपूर्ति में 70% तक की कमी आई है।
- कृषि और उर्वरक: इस युद्ध के चलते भारत का कृषि निर्यात और उर्वरकों (यूरिया, डीएपी) का उत्पादन भी प्रभावित हुआ है, क्योंकि गैस की सप्लाई बाधित होने से कई प्लांट अपनी क्षमता से कम उत्पादन कर रहे हैं।


