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    माफी के कुछ ही घंटों बाद फिर खाड़ी देशों पर हमला, IRGC ने ईरान के राष्ट्रपति को दिखाया ठेंगा?

    ईरान इस समय अपने आधुनिक इतिहास के सबसे गंभीर राजनीतिक और सैन्य संकट से गुजर रहा है। 28 फरवरी, 2026 को एक भीषण हवाई हमले में सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई की मौत के बाद तेहरान की सत्ता में एक ऐसा शून्य पैदा हो गया है, जिसने देश को आंतरिक संघर्ष और बाहरी युद्ध के मुहाने पर खड़ा कर दिया है।

    माफी और मिसाइल: विरोधाभास

    ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने हाल ही में खाड़ी देशों (GCC) से उन मिसाइल और ड्रोन हमलों के लिए माफी मांगी, जिन्होंने सऊदी अरब, यूएई और कतर जैसे पड़ोसियों को निशाना बनाया था। उन्होंने आश्वासन दिया कि ईरान अब किसी भी पड़ोसी पर हमला नहीं करेगा, बशर्ते उनकी जमीन का इस्तेमाल ईरान के खिलाफ न हो।

    हालांकि, इस माफी के कुछ ही घंटों बाद फिर से खाड़ी देशों में सायरन गूंजने लगे। रिपोर्टों के अनुसार, ईरानी सेना और रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) के कुछ धड़े राष्ट्रपति के आदेशों को नजरअंदाज कर स्वतंत्र रूप से हमले जारी रखे हुए हैं। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि तेहरान की चुनी हुई सरकार और सैन्य नेतृत्व के बीच समन्वय पूरी तरह टूट चुका है।


    सत्ता के लिए अंदरूनी टकराव

    खामेनेई के बाद उत्तराधिकार की जंग अब तेज हो गई है। वर्तमान में देश का शासन एक तीन सदस्यीय अंतरिम परिषद चला रही है, जिसमें शामिल हैं:

    1. राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन
    2. मुख्य न्यायाधीश गुलाम-हुसैन मोहसेनी-एजेई
    3. वरिष्ठ मौलवी अलीरेजा अराफी

    प्रमुख दावेदार और चुनौतियां:

    • मुजतबा खामेनेई: दिवंगत नेता के बेटे मुजतबा सबसे मजबूत दावेदार बनकर उभरे हैं। उन्हें IRGC और कट्टरपंथी गुटों का समर्थन प्राप्त है, लेकिन उनकी नियुक्ति ईरान में “वंशवाद” के आरोपों को हवा दे सकती है।
    • अलीरेजा अराफी: अंतरिम परिषद के सदस्य और एक वरिष्ठ मौलवी, जिन्हें धार्मिक संस्थाओं का समर्थन प्राप्त है।
    • हसन खुमैनी: ईरान के संस्थापक अयातुल्ला खुमैनी के पोते, जिन्हें सुधारवादी गुटों का मौन समर्थन मिल सकता है, हालांकि उन्हें मुख्यधारा से दूर रखा गया है।

    ईरान में सैन्य तानाशाही का खतरा

    ईरान की असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स (88 मौलवियों की संस्था) पर भारी दबाव है कि वे जल्द से जल्द नए सर्वोच्च नेता का चुनाव करें। लेकिन इजरायली और अमेरिकी हमलों ने सरकारी इमारतों और संचार तंत्र को इतना नुकसान पहुंचाया है कि यह प्रक्रिया बाधित हो रही है।

    अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि यदि सत्ता के हस्तांतरण में और देरी हुई, तो IRGC पूरी तरह से कमान अपने हाथ में ले सकती है, जिससे ईरान एक सैन्य तानाशाही में बदल सकता है। फिलहाल, जनता के बीच बढ़ता असंतोष और सड़कों पर जारी छिटपुट विरोध प्रदर्शन इस संकट को और गहरा बना रहे हैं।

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