हालिया घटनाक्रमों में एक बड़ा मोड़ तब आया जब डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर को अपना समर्थन और एक तरह से ‘आशीर्वाद’ दिया है। यह कदम दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत है। ट्रंप प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि वे तालिबान (विशेषकर तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान या TTP) के खिलाफ पाकिस्तान की लड़ाई में उसके साथ खड़े हैं।
तालिबान के खिलाफ लड़ाई और पाकिस्तान की भूमिका
अफगानिस्तान में तालिबान के सत्ता में आने के बाद से पाकिस्तान के सीमावर्ती इलाकों में आतंकी हमलों में भारी वृद्धि हुई है। पाकिस्तान लगातार आरोप लगाता रहा है कि अफगान तालिबान TTP के आतंकियों को शरण दे रहा है। डोनाल्ड ट्रंप ने इस मुद्दे पर पाकिस्तान के रुख का समर्थन किया है। हालांकि, ट्रंप का यह समर्थन पहले के अमेरिकी प्रशासनों से थोड़ा अलग है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि अमेरिका पाकिस्तान को संसाधन और नैतिक समर्थन तो देगा, लेकिन वह खुद इस युद्ध में सीधे तौर पर हस्तक्षेप (Intervention) नहीं करेगा।
‘नो इंटरवेंशन’ की नीति
डोनाल्ड ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति इस बार भी उनके फैसलों में साफ झलक रही है। उन्होंने साफ कर दिया है कि अमेरिका अब दुनिया का पुलिसकर्मी बनकर दूसरे देशों की लड़ाइयों में अपने सैनिक नहीं झोंकेगा। पाकिस्तान और तालिबान के बीच चल रहे संघर्ष को लेकर उनका रुख ‘सहयोग पर आधारित समर्थन’ का है, न कि प्रत्यक्ष सैन्य भागीदारी का। ट्रंप चाहते हैं कि पाकिस्तान खुद अपनी सुरक्षा चुनौतियों से निपटे, जबकि अमेरिका उसे कूटनीतिक और सामरिक रूप से मजबूत करेगा।
असीम मुनीर की महत्ता
जनरल असीम मुनीर को ट्रंप का समर्थन मिलना पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति के लिए भी बड़ा संदेश है। पाकिस्तान में अक्सर सेना और नागरिक सरकार के बीच सत्ता का संतुलन बदलता रहता है, लेकिन ट्रंप का सीधा संवाद और समर्थन सेना प्रमुख के प्रति होना यह दर्शाता है कि अमेरिका पाकिस्तान में ‘पावर सेंटर’ किसे मानता है।
क्षेत्रीय प्रभाव
अमेरिका के इस रुख से अफगानिस्तान के तालिबान शासन पर दबाव बढ़ने की उम्मीद है। यदि अमेरिका और पाकिस्तान के बीच सैन्य सहयोग बढ़ता है, तो इससे चीन और भारत के लिए भी नए समीकरण पैदा होंगे। भारत हमेशा से पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद पर चिंता जताता रहा है, ऐसे में ट्रंप का पाकिस्तान को ‘ब्लैंक चेक’ देना या केवल TTP तक सीमित रहना, देखने वाली बात होगी।
डोनाल्ड ट्रंप और असीम मुनीर के बीच यह ‘नया अध्याय’ तालिबान के लिए खतरे की घंटी हो सकता है, लेकिन पाकिस्तान के लिए यह अपनी खोई हुई साख को अमेरिका की नजरों में फिर से स्थापित करने का एक मौका है।


