रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह इस बार दिवाली शेरथांग युद्ध स्मारक पर जवानों के साथ मनाएंगे। यह स्मारक सिक्किम में नाथूला दर्रे के पास स्थित है और 1967 में भारत-चीन के बीच हुई सैन्य भिड़ंत में शहीद हुए सैनिकों की याद दिलाता है। इस ऐतिहासिक संघर्ष में भारतीय जवानों ने चीनी सैनिकों के हमलों का जवाब दिया और उनके सैन्य ठिकानों पर भारी गोलाबारी की।
नाथूला में कैसे शुरू हुई थी भिड़ंत?
1967 में भारत और चीन के बीच सिक्किम सीमा पर तनाव बढ़ गया था। भारतीय सेना ने नाथूला में सीमा पर कंटीले तारों की बाड़ लगाने का काम शुरू किया। चीन ने इसका विरोध किया। 11 सितंबर को बातचीत के दौरान अचानक चीनी सैनिकों ने गोलीबारी शुरू कर दी, जिसमें भारतीय सेना के कई जवान शहीद हुए।
इसके बाद भारतीय सेना ने जवाबी कार्रवाई की और आसपास के चीनी सैन्य ठिकानों पर तोपों से हमला किया। इस कार्रवाई में चीनी सेना को भी भारी नुकसान हुआ। बाद में दोनों पक्षों के बीच तनाव कम हुआ, लेकिन अक्टूबर में चो ला क्षेत्र में फिर भिड़ंत हुई।
भारतीय सेना ने कैसे खदेड़ा चीनी सैनिकों को?
नाथूला की लड़ाई में भारतीय सेना ने मजबूत जवाबी कार्रवाई की। भारतीय सैनिकों ने चीनी सेना की गोलीबारी का सामना करते हुए अपनी स्थिति बनाए रखी। तोपखाने की कार्रवाई से चीनी मोर्चों को नुकसान पहुंचा और भारतीय सेना ने सीमा पर अपनी पकड़ मजबूत की।
यह संघर्ष भारत-चीन सैन्य इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय माना जाता है। नाथूला और चो ला की घटनाओं ने दिखाया कि कठिन पहाड़ी इलाकों में सैनिकों की तैयारी, नेतृत्व और रणनीतिक स्थिति कितनी अहम होती है।
शेरथांग में राजनाथ सिंह क्यों मनाएंगे दिवाली?
राजनाथ सिंह 8 नवंबर को शेरथांग युद्ध स्मारक जाकर शहीदों को श्रद्धांजलि देंगे और सीमा पर तैनात जवानों से मुलाकात करेंगे। इससे पहले उन्होंने बागडोगरा और सुकना में सेना के जवानों के साथ दिवाली मनाई। रक्षा मंत्री ने कहा है कि वह उन वीर सैनिकों को नमन करेंगे, जिन्होंने देश की रक्षा करते हुए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया।
चीन सीमा पर आज भी अहम है नाथूला
नाथूला दर्रा भारत और चीन के बीच रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र है। यहां से सीमा की निगरानी और सैन्य गतिविधियों पर नजर रखी जाती है। भारत और चीन के बीच सीमा विवाद के बावजूद दोनों देशों की सेनाएं बातचीत के जरिए शांति बनाए रखने की कोशिश करती रही हैं।
राजनाथ सिंह का शेरथांग दौरा सैनिकों का मनोबल बढ़ाने और 1967 के शहीदों के बलिदान को याद करने का अवसर होगा। यह दौरा उन जवानों के प्रति सम्मान का संदेश भी है, जो कठिन परिस्थितियों में देश की सीमाओं की रक्षा कर रहे हैं।


