इजरायल की राजनीति में 2026 का चुनाव प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व और देश की भावी नीतियों के लिहाज से अहम माना जा रहा है। लंबे समय से इजरायली राजनीति के केंद्र में रहे नेतन्याहू के सामने सुरक्षा, गाजा युद्ध, बंधकों का मुद्दा, अर्थव्यवस्था और गठबंधन की राजनीति जैसी कई चुनौतियां हैं। ऐसे में सवाल है कि क्या वह एक बार फिर सत्ता में वापसी कर पाएंगे या विपक्ष उनके नेतृत्व को चुनौती देने में सफल होगा?
इजरायल में चुनावी मुकाबला केवल प्रधानमंत्री चुनने तक सीमित नहीं है। इसका असर देश की सुरक्षा नीति, फलस्तीन के साथ संबंधों, क्षेत्रीय कूटनीति और अमेरिका सहित दूसरे देशों के साथ रिश्तों पर भी पड़ सकता है।
कौन-कौन हैं प्रमुख दावेदार?
1. बेंजामिन नेतन्याहू — लिकुड पार्टी
नेतन्याहू अपनी दक्षिणपंथी और धार्मिक दलों के गठबंधन के सहारे सत्ता में बने रहने की कोशिश कर रहे हैं। उनके सामने 7 अक्टूबर 2023 के हमास हमले को रोकने में हुई सुरक्षा संबंधी चूकों, युद्ध और सरकार की नीतियों को लेकर उठे सवाल हैं।
2. गादी आइज़ेनकोट — याशर पार्टी
पूर्व सैन्य प्रमुख आइज़ेनकोट नेतन्याहू के प्रमुख प्रतिद्वंद्वियों में शामिल हैं। उनकी राजनीति में सुरक्षा, सरकारी जवाबदेही और प्रशासन में ईमानदारी प्रमुख विषय हैं। उनकी नई पार्टी याशर विपक्षी राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।
3. नफ्ताली बेनेट और यायर लैपिड
दोनों नेता ‘टुगेदर’ सूची के माध्यम से नेतन्याहू विरोधी खेमे को एकजुट करने की कोशिश कर रहे हैं। 2021 में दोनों ने अलग-अलग विचारधारा वाले दलों के साथ मिलकर नेतन्याहू को सत्ता से बाहर करने में भूमिका निभाई थी।
इसके अलावा पूर्व रक्षा मंत्री अविगदोर लिबरमैन और वामपंथी दलों के नेता यायर गोलान भी चुनावी मुकाबले में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
चुनाव में कौन से मुद्दे हावी रहेंगे?
1. हमास हमला और सुरक्षा की जवाबदेही: 7 अक्टूबर 2023 को हुए हमले के बाद सुरक्षा व्यवस्था में चूक की जांच और सरकार की जिम्मेदारी तय करने की मांग चुनाव का बड़ा मुद्दा है। कई इजरायली स्वतंत्र जांच आयोग गठित करने की मांग करते रहे हैं।
2. गाजा युद्ध और बंधकों का सवाल: हमास के खिलाफ सैन्य कार्रवाई, बंधकों की रिहाई और भविष्य में गाजा की व्यवस्था को लेकर सरकार की नीतियां मतदाताओं के फैसले को प्रभावित कर सकती हैं।
3. सैन्य सेवा में समानता: धार्मिक यहूदी समुदाय के कुछ वर्गों को अनिवार्य सैन्य सेवा से छूट देने का मुद्दा विवादास्पद है। युद्ध के दौरान सेना पर बढ़ते दबाव के बीच इस छूट को लेकर राजनीतिक दलों के बीच मतभेद हैं।
4. न्यायपालिका और अर्थव्यवस्था: सुप्रीम कोर्ट की शक्तियां, सरकार और न्यायपालिका के बीच संतुलन, जीवनयापन की लागत और युद्ध का आर्थिक प्रभाव भी चुनावी बहस के केंद्र में हैं।
कैसे तय होगी इजरायल की सत्ता?
इजरायल में चुनाव 27 अक्टूबर 2026 को होने हैं। यहां मतदाता सीधे प्रधानमंत्री का चुनाव नहीं करते, बल्कि 120 सदस्यीय संसद यानी नेसेट के लिए मतदान करते हैं। सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन आवश्यक है।
इसी वजह से किसी एक पार्टी का सबसे बड़ी पार्टी बनना सरकार बनाने की गारंटी नहीं है। नेतन्याहू को लिकुड के साथ दक्षिणपंथी और धार्मिक दलों का समर्थन चाहिए, जबकि विपक्ष को अलग-अलग विचारधारा वाली पार्टियों के बीच सहमति बनानी होगी।
छोटी पार्टियों का प्रदर्शन भी निर्णायक हो सकता है। किसी दल का जरूरी मत प्रतिशत हासिल नहीं कर पाना सीटों के पूरे गणित को बदल सकता है। इसी तरह चुनाव के बाद गठबंधन बनाने के लिए होने वाली बातचीत प्रधानमंत्री के चयन में महत्वपूर्ण होगी।
क्या नेतन्याहू का दौर खत्म हो सकता है?
चुनाव से पहले के सर्वेक्षणों में नेतन्याहू के गठबंधन और विपक्ष के बीच कड़ा मुकाबला दिखाई दिया है। हालांकि, किसी भी खेमे के लिए स्पष्ट बहुमत का रास्ता आसान नहीं माना जा सकता। सर्वेक्षण अंतिम नतीजे नहीं होते और गठबंधन की संभावनाएं चुनाव के बाद बदल सकती हैं।
इसलिए 2026 का चुनाव केवल नेतन्याहू के राजनीतिक भविष्य का सवाल नहीं है। यह इजरायल की सुरक्षा नीति, धार्मिक और धर्मनिरपेक्ष समूहों के बीच संतुलन, न्यायपालिका की भूमिका और क्षेत्रीय संघर्षों से निपटने की दिशा भी तय करेगा। असली तस्वीर मतदान के नतीजों और उसके बाद बनने वाले गठबंधन से स्पष्ट होगी।


