राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत के विजयादशमी संबोधन की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तारीफ की है। पीएम मोदी ने उनके भाषण को ‘बेहद प्रेरणादायी’ बताते हुए कहा कि इसमें राष्ट्र की प्रगति, सामाजिक एकता और आत्मनिर्भरता जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर जोर दिया गया। वहीं, नागपुर में संघ के विजयादशमी उत्सव को संबोधित करते हुए भागवत ने कहा कि भारत में भी सत्ता परिवर्तन के प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन देश को अस्थिर करने की कोशिशें सफल नहीं होंगी। उन्होंने फ्रांस, अल्बानिया, बांग्लादेश और नेपाल में हुए घटनाक्रमों का उल्लेख करते हुए कहा कि केवल सत्ता बदलने से परिस्थितियां नहीं बदल जातीं।
पीएम मोदी ने सोशल मीडिया पर की तारीफ
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 20 अक्टूबर को सोशल मीडिया मंच एक्स पर मोहन भागवत के संबोधन को लेकर अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने लिखा कि संघ प्रमुख का शताब्दी वर्ष के विजयादशमी उत्सव पर दिया गया संबोधन बेहद प्रेरणादायी था। मोदी ने कहा कि भागवत ने राष्ट्रीय प्रगति और सामाजिक एकता के साथ आत्मनिर्भरता तथा समाज के चरित्र को मजबूत बनाने की जरूरत पर विस्तार से बात की।
प्रधानमंत्री ने विशेष रूप से सेवा और राष्ट्र निर्माण के प्रति प्रतिबद्धता का उल्लेख किया। उनके अनुसार, ये मूल्य संघ के प्रत्येक स्वयंसेवक के कार्य का अभिन्न हिस्सा हैं। मोदी ने भागवत के ‘पंच परिवर्तन’ संबंधी विचारों की भी सराहना की और कहा कि इनके माध्यम से समाज में सकारात्मक बदलाव लाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया जा सकता है।
‘सत्ता बदलने से परिस्थिति नहीं बदलती’
नागपुर के रेशिमबाग मैदान में आयोजित कार्यक्रम में मोहन भागवत ने दुनिया के विभिन्न देशों में हो रहे राजनीतिक और सामाजिक घटनाक्रमों पर अपनी बात रखी। उन्होंने फ्रांस, अल्बानिया, बांग्लादेश और नेपाल का जिक्र करते हुए कहा कि कुछ ताकतें अपने हितों को साधने के लिए सरकारों को बदलने की कोशिश करती हैं।
भागवत ने कहा कि यह मान लेना सही नहीं है कि सत्ता परिवर्तन से हर समस्या का समाधान हो जाएगा। उन्होंने दावा किया कि भारत में भी इसी तरह के प्रयास हो रहे हैं, लेकिन पिछले दशकों में देश ने दृढ़ नीतियों और मजबूत नेतृत्व के सहारे प्रगति की है। RSS प्रमुख ने आरोप लगाया कि कुछ बाहरी ताकतें भारत की प्रगति से असहज हैं और देश को कमजोर करने का प्रयास कर रही हैं। उन्होंने यह भी कहा कि देश के भीतर कुछ महत्वाकांक्षी नेता अपने राजनीतिक स्वार्थ के कारण ऐसी कोशिशों में मददगार बन सकते हैं।
आंदोलन हों, लेकिन उद्देश्य समाधान हो
भागवत ने लोकतंत्र में आंदोलनों की भूमिका को स्वीकार करते हुए कहा कि उनका उद्देश्य समस्याओं का समाधान होना चाहिए, न कि समाज में कटुता और विभाजन पैदा करना। उन्होंने कहा कि विरोध करने वाले समूहों, कानून-व्यवस्था संभालने वाले प्रशासन और राजनीतिक नेतृत्व—सभी को संवैधानिक मर्यादाओं का पालन करना चाहिए।
उन्होंने चेताया कि राजनीतिक लाभ, वोट और सस्ती लोकप्रियता की इच्छा विवेक तथा सद्भावना पर हावी नहीं होनी चाहिए। उनके अनुसार, किसी भी आंदोलन की सफलता इस बात से तय होनी चाहिए कि वह समाज की समस्याओं को दूर करने में कितना योगदान देता है।
संघ के शताब्दी वर्ष में राष्ट्रीय एकता का संदेश
RSS की स्थापना वर्ष 1925 में हुई थी। संगठन के 101वें स्थापना दिवस और शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों के दौरान भागवत का यह संबोधन ऐसे समय आया है, जब देश में विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं।
प्रधानमंत्री मोदी की प्रतिक्रिया और भागवत के बयान ने राष्ट्र निर्माण, सामाजिक एकता तथा राजनीतिक आंदोलनों की भूमिका को फिर चर्चा में ला दिया है। दोनों नेताओं की टिप्पणियों में सेवा, सामाजिक जिम्मेदारी और राष्ट्रीय प्रगति पर जोर दिखाई देता है। हालांकि, सत्ता परिवर्तन और विरोध प्रदर्शनों को लेकर भागवत की टिप्पणियां उनके विचारों के रूप में ही देखी जानी चाहिए; इन्हें स्वतंत्र रूप से प्रमाणित तथ्य नहीं माना जा सकता।


