यूरोपीय देश अल्बानिया में सरकार विरोधी हिंसक प्रदर्शनों और सुप्रीम कोर्ट को निशाना बनाए जाने की घटना पर भारत में राजनीतिक बहस तेज हो गई है। शिवसेना (यूबीटी) के सांसद संजय राउत ने अल्बानिया में हुई घटनाओं का जिक्र करते हुए भारत को भी इससे सबक लेने की सलाह दी। उनके इस बयान पर भाजपा ने विपक्षी गठबंधन को घेरा और सवाल किया कि क्या विपक्ष देश में अराजकता चाहता है? वहीं, शिवसेना (यूबीटी) की नेता प्रियंका चतुर्वेदी ने भी राउत के विचारों से असहमति जताते हुए कहा कि भारत को किसी दूसरे देश से सीखने की जरूरत नहीं है।
संजय राउत ने क्या कहा था?
संजय राउत ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अल्बानिया में जारी हिंसक प्रदर्शनों से जुड़ा एक वीडियो साझा किया था। उन्होंने अपनी पोस्ट में दावा किया कि वहां के लोग भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे प्रधानमंत्री को न्यायपालिका से मदद मिलने के कारण नाराज थे। प्रदर्शनकारियों ने सुप्रीम कोर्ट, संसद और सरकारी कार्यालयों को निशाना बनाया।
राउत ने इन घटनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि सभी देशों को इससे सबक लेना चाहिए, खासकर भारत को। उनके इस बयान को लेकर राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया। भाजपा ने इसे लोकतांत्रिक संस्थाओं के खिलाफ हिंसा को उचित ठहराने की कोशिश के रूप में पेश किया।
भाजपा ने विपक्षी गठबंधन पर साधा निशाना
भाजपा नेता प्रदीप भंडारी ने राउत के बयान पर पलटवार करते हुए कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों पर निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्षी गठबंधन अराजकता की कल्पना कर रहा है और उसकी टिप्पणियां लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए खतरा पैदा कर सकती हैं।
भंडारी ने सवाल उठाया कि क्या कांग्रेस और उसका गठबंधन देश में अराजकता चाहते हैं? भाजपा ने राउत के बयान को लेकर विपक्ष की मंशा पर सवाल खड़े किए। इस तरह अल्बानिया की घटनाओं को लेकर शुरू हुई चर्चा ने भारतीय राजनीति में सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का रूप ले लिया।
किरेन रिजिजू ने भी दी प्रतिक्रिया
केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने भी इस मुद्दे पर विपक्ष को घेरा। उन्होंने आरोप लगाया कि भारत में कुछ राजनीतिक तत्व और भारत-विरोधी समूह युवाओं को भड़काकर हिंसा फैलाने की कोशिश कर रहे हैं। रिजिजू ने कहा कि देश में सत्ता परिवर्तन का रास्ता चुनाव है, न कि हिंसा या बाहरी ताकतों के जरिए बदलाव लाना।
हालांकि, विपक्ष की ओर से इन आरोपों पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। राजनीतिक बयानबाजी के बीच लोकतांत्रिक व्यवस्था और विरोध-प्रदर्शन की सीमाओं पर बहस तेज हो गई है।
प्रियंका चतुर्वेदी ने राउत को दी नसीहत
शिवसेना (यूबीटी) की नेता प्रियंका चतुर्वेदी ने भी संजय राउत के बयान से असहमति जताई। उन्होंने कहा कि भारत को किसी दूसरे देश से सीखने की जरूरत नहीं है। उनके मुताबिक, अल्बानिया ने लंबे समय तक कम्युनिस्ट तानाशाही का दौर देखा है। ऐसे में वहां की हिंसक घटनाओं को भारत के लिए उदाहरण के रूप में पेश करना उचित नहीं है।
प्रियंका ने स्पष्ट किया कि कानून को अपने हाथ में लेना, व्यवस्था को बाधित करना और सुप्रीम कोर्ट या संसद जैसी संस्थाओं को अस्थिर करना स्वीकार्य नहीं हो सकता। उन्होंने बांग्लादेश में हुए प्रदर्शनों का जिक्र करते हुए हिंसक तरीके से सत्ता परिवर्तन की मांग पर भी चिंता जताई।
उनका कहना था कि लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन चुनावों के माध्यम से होना चाहिए। इस घटनाक्रम ने शिवसेना (यूबीटी) के नेताओं के बीच भी इस मुद्दे पर सार्वजनिक मतभेद उजागर कर दिए हैं।
क्या है अल्बानिया में हिंसा का मामला?
अल्बानिया की राजधानी तिराना में प्रधानमंत्री एडी रामा के इस्तीफे की मांग को लेकर विरोध-प्रदर्शन हिंसक हो गए। प्रदर्शनकारियों ने सरकारी इमारतों और अन्य प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया। भ्रष्टाचार के आरोप, शिक्षा से जुड़ी मांगें और एक विवादित तटीय परियोजना को लेकर असंतोष आंदोलन के प्रमुख कारणों में शामिल बताए गए हैं।
इस घटनाक्रम के बाद भारत में राजनीतिक दलों के बीच बहस छिड़ गई है। भाजपा जहां राउत के बयान को लेकर विपक्ष पर सवाल उठा रही है, वहीं प्रियंका चतुर्वेदी ने हिंसक प्रदर्शनों से प्रेरणा लेने के विचार को खारिज किया है। फिलहाल विवाद का केंद्र यही है कि दूसरे देशों में हुए आंदोलनों से सबक लेने की बात कहां तक उचित है और लोकतांत्रिक विरोध तथा हिंसा के बीच अंतर को कैसे समझा जाए।


