कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और उसके प्रमुख मोहन भागवत को लेकर अपने विचार सामने रखते हुए एक अहम सवाल उठाया है। उन्होंने कहा कि क्या भारत के धर्मनिरपेक्ष और उदारवादी विचारों वाले लोग RSS के साथ मिलकर रहने का रास्ता निकाल सकते हैं? थरूर के इस रुख ने राजनीतिक हलकों में चर्चा को तेज कर दिया है। उन्होंने संघ के 101वें वर्ष में प्रवेश के मौके पर संगठन के इतिहास, उसकी विचारधारा और बदलते स्वरूप पर विचार किया है।
थरूर ने संघ के प्रति असहजता रखने वाले लोगों की चिंताओं का भी उल्लेख किया। उनके मुताबिक, RSS के प्रभाव और उसकी सामाजिक भूमिका को नजरअंदाज करना आसान नहीं है। हालांकि, संघ के साथ सह-अस्तित्व का रास्ता तलाशने का अर्थ उसकी विचारधारा से सहमत होना नहीं है। इस बहस में संगठन के दावों, उसके व्यवहार और समावेशिता के सवालों को अलग-अलग देखना जरूरी है।
मोहन भागवत के नेतृत्व में बदलाव पर चर्चा
RSS प्रमुख मोहन भागवत ने हाल के वर्षों में विभिन्न सामाजिक और राष्ट्रीय मुद्दों पर अपने विचार रखे हैं। विजयादशमी के अवसर पर 20 अक्टूबर को नागपुर में दिए गए संबोधन में उन्होंने सामाजिक एकता, राष्ट्रीय प्रगति, सांस्कृतिक पहचान और देश के सामने मौजूद चुनौतियों पर बात की थी। संघ ने अपने शताब्दी वर्ष के दौरान भी संगठन की भूमिका और उसके विचारों को व्यापक समाज तक पहुंचाने पर जोर दिया है।
थरूर के लेख में संघ के बदलते स्वर और उसके बढ़ते सामाजिक प्रभाव को समझने की जरूरत पर ध्यान दिया गया है। संघ समर्थक इसे राष्ट्रसेवा, अनुशासन और सांस्कृतिक पहचान से जोड़ते हैं, जबकि आलोचक इसकी विचारधारा और सामाजिक प्रभाव को लेकर सवाल उठाते रहे हैं। ऐसे में संगठन के बारे में किसी एक धारणा पर टिकने के बजाय उसके बयानों और वास्तविक गतिविधियों की पड़ताल जरूरी है।
संघ से असहमति के बावजूद संवाद जरूरी?
थरूर की टिप्पणी का एक अहम पहलू यह है कि असहमति के बावजूद बातचीत के रास्ते बंद नहीं होने चाहिए। भारतीय राजनीति में RSS को लेकर कांग्रेस और भाजपा के बीच लंबे समय से वैचारिक मतभेद रहे हैं। कांग्रेस के कई नेता संघ की विचारधारा की आलोचना करते हैं, जबकि भाजपा और संघ से जुड़े लोग संगठन को राष्ट्रनिर्माण और सामाजिक सेवा में योगदान देने वाला बताते हैं।
ऐसे माहौल में थरूर का सवाल इस बात पर केंद्रित है कि क्या अलग-अलग विचारधाराओं के लोग एक-दूसरे के साथ लोकतांत्रिक तरीके से रह सकते हैं। हालांकि, संवाद की गुंजाइश का मतलब यह नहीं कि आलोचना या असहमति छोड़ दी जाए। किसी भी संगठन के विचारों और गतिविधियों पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक विमर्श का हिस्सा है।
RSS के बढ़ते प्रभाव और आलोचनाओं का सवाल
संघ की स्थापना 1925 में हुई थी और अब वह अपने 101वें वर्ष में प्रवेश कर चुका है। इस दौरान उसका सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव बढ़ा है। RSS से प्रेरित संगठनों के व्यापक नेटवर्क में भाजपा भी शामिल है, जो देश की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
थरूर के विचारों में संघ के प्रति असहजता रखने वाले उदारवादी और धर्मनिरपेक्ष भारतीयों की चिंताओं को भी जगह मिली है। आलोचकों का कहना है कि संघ से जुड़े कुछ लोगों की गतिविधियां समावेशिता और सामाजिक सौहार्द के सवाल खड़े करती हैं। ऐसे मामलों में संगठन के नेतृत्व के बयानों और उसके समर्थकों के व्यवहार के बीच तालमेल होना चाहिए।
क्या सह-अस्तित्व से दूर हो सकते हैं वैचारिक मतभेद?
थरूर की टिप्पणी को RSS के प्रति बिना शर्त समर्थन के तौर पर देखना सही नहीं होगा। उनका सवाल व्यापक सामाजिक संदर्भ में है कि गहरे वैचारिक मतभेदों के बावजूद भारतीय समाज साथ रहने का रास्ता कैसे तलाश सकता है। इसके लिए संवाद के साथ-साथ समान नागरिक अधिकारों, लोकतांत्रिक मूल्यों और विविधता के सम्मान को भी महत्व देना होगा।
फिलहाल, थरूर के विचारों ने RSS की भूमिका और उसके साथ संवाद की संभावनाओं पर नई चर्चा शुरू कर दी है। यह बहस आने वाले समय में भी जारी रह सकती है कि संगठन अपने बढ़ते प्रभाव के साथ समावेशिता और सामाजिक सौहार्द की चुनौतियों से किस तरह निपटता है।


