उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन को लेकर एक बार फिर सवाल उठने लगे हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मंगलवार को दिल्ली में हुए INDIA गठबंधन के मार्च में राहुल गांधी और अखिलेश यादव एक साथ तो नजर आए, लेकिन दोनों नेताओं के बीच पहले जैसी राजनीतिक गर्मजोशी दिखाई नहीं दी। अखिलेश यादव अपने पार्टी सांसदों के साथ राहुल गांधी से एक कतार पीछे चलते नजर आए। इस दृश्य ने यूपी में दोनों दलों के बीच सीट बंटवारे और गठबंधन की दिशा को लेकर चर्चाओं को हवा दे दी है।
मार्च में साथ, लेकिन अलग अंदाज
दिल्ली में विपक्षी सांसदों का मार्च संसद के मकर द्वार से चुनाव आयोग की ओर निकाला गया था। प्रदर्शन का मुद्दा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर विपक्ष की आपत्तियां थीं। मार्च के दौरान राहुल गांधी आगे दिखाई दिए, जबकि अखिलेश यादव अपने सांसदों के साथ पीछे चल रहे थे। बाद में पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को रोक दिया और कई नेताओं को हिरासत में लिया, जिनमें अखिलेश यादव भी शामिल थे।
हालांकि, केवल मार्च के दौरान नेताओं की स्थिति को गठबंधन टूटने का प्रमाण नहीं माना जा सकता। दोनों दल INDIA गठबंधन के मंच पर साथ मौजूद थे और प्रदर्शन के मुद्दे पर उनकी दिशा समान रही।
पहले जैसी ‘दो लड़कों’ वाली केमिस्ट्री क्यों नहीं?
राहुल गांधी और अखिलेश यादव की जोड़ी 2024 के लोकसभा चुनाव और इससे पहले के कई राजनीतिक कार्यक्रमों में साथ दिखाई देती रही है। लेकिन दिल्ली के इस प्रदर्शन में वह करीबी नजर नहीं आई। राजनीतिक विश्लेषकों के बीच इसे यूपी में दोनों दलों के बीच चल रही सीट बंटवारे की संभावित खींचतान से जोड़कर देखा जा रहा है।
इसके अलावा 30 सितंबर को हुई INDIA गठबंधन की बैठक में भी अखिलेश यादव शामिल नहीं हुए थे। उनकी जगह सपा ने सांसद हरेंद्र मलिक और मोहिबुल्लाह नदवी को बैठक में भेजा था। उस समय अखिलेश लखनऊ में सपा उम्मीदवारों के राज्यसभा नामांकन से जुड़े कार्यक्रम में मौजूद थे।
गठबंधन की मजबूरी या चुनावी जरूरत?
यूपी विधानसभा चुनाव 2027 से पहले सपा और कांग्रेस दोनों के सामने गठबंधन को लेकर रणनीतिक चुनौती है। दोनों दलों के समर्थकों का एक वर्ग चाहता है कि 2024 लोकसभा चुनाव की तरह दोनों पार्टियां साथ रहें। ऐसे में गठबंधन से अलग होने का फैसला दोनों के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो सकता है।
दूसरी ओर, कांग्रेस के कुछ नेताओं की ओर से सीट बंटवारे में बराबरी की हिस्सेदारी की मांग और सपा की ओर से यूपी की बड़ी संख्या में सीटों पर तैयारी के संकेतों ने भी चर्चाओं को बढ़ाया है।
फिलहाल दिल्ली मार्च की तस्वीरें गठबंधन में दरार का अंतिम प्रमाण नहीं हैं, लेकिन दोनों दलों के बीच रणनीति, नेतृत्व और सीट बंटवारे को लेकर मतभेदों की चर्चा जरूर तेज हो गई है। आने वाले महीनों में दोनों पार्टियों के रुख से साफ होगा कि यह दूरी महज राजनीतिक मंच की स्थिति थी या गठबंधन की बड़ी रणनीति का संकेत।


