दिल्ली-एनसीआर समेत उत्तर भारत में सर्दियों की दस्तक के साथ वायु प्रदूषण का खतरा बढ़ने लगा है। पंजाब में पराली जलाने से उठने वाला धुआं दिल्ली तक पहुंच रहा है। वहीं हरियाणा में खुले में कूड़ा जलाने की समस्या प्रशासनिक कार्रवाई और करोड़ों रुपये के जुर्माने के बावजूद थम नहीं रही। दोनों समस्याएं मिलकर हवा की गुणवत्ता बिगाड़ रही हैं। इसका असर केवल शहरों तक सीमित नहीं, बल्कि ग्रामीण इलाकों और आसपास के राज्यों में भी महसूस किया जा रहा है।
पराली के धुएं में ब्लैक कार्बन का खतरा
पंजाब में धान की कटाई के बाद खेतों में बची पराली जलाने की घटनाएं प्रदूषण का बड़ा कारण बन रही हैं। पराली के धुएं में ब्लैक कार्बन और सूक्ष्म कण मौजूद होते हैं, जो वातावरण में पहुंचकर हवा की गुणवत्ता खराब करते हैं। हवा की दिशा और मौसम की परिस्थितियां इस धुएं को दूसरे राज्यों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
ब्लैक कार्बन सूर्य की ऊर्जा को सोखने वाला प्रदूषक है। यह वातावरण को गर्म करने में योगदान देता है और बर्फ पर जमने से उसके पिघलने की प्रक्रिया तेज कर सकता है। इसके साथ मौजूद पीएम 2.5 जैसे सूक्ष्म कण सांस के जरिए शरीर में पहुंचकर स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां बढ़ा सकते हैं।
दिल्ली में 3 नवंबर को वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) 350 तक पहुंच गया, जो बेहद खराब श्रेणी में है। पंजाब में पराली जलाने की घटनाओं के साथ प्रतिकूल मौसम ने प्रदूषण को गंभीर बनाया। गुरुग्राम और नोएडा जैसे शहर भी खराब हवा की चपेट में आए।
हरियाणा में 52 करोड़ रुपये का जुर्माना, फिर भी नहीं रुक रही कूड़े की आग
हरियाणा में खुले में कचरा फेंकने और उसे जलाने की समस्या भी प्रदूषण को बढ़ा रही है। प्रदेश में 2023 से अप्रैल 2026 तक 16 शहरी निकायों और आठ निजी एजेंसियों पर 52.36 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया गया। इसके बावजूद कचरे का वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण पूरी तरह सुनिश्चित नहीं हो पाया है। इस अवधि में अवैध रूप से कचरा डालने पर 7705 चालान किए गए, जबकि खुले में कूड़ा जलाने के 469 मामले दर्ज किए गए। प्लास्टिक कचरे से जुड़े नियमों के उल्लंघन पर भी हजारों चालान हुए। हरियाणा के 87 शहरी निकायों को कचरा प्रबंधन के लिए 11 क्लस्टरों में बांटा गया है। हालांकि, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की जांच में 18 निकायों में से 16 के पास चालू सैनिटरी लैंडफिल नहीं होने की बात सामने आई। इससे कचरे के सुरक्षित निस्तारण की चुनौती स्पष्ट होती है।
सर्दियों में क्यों बढ़ जाता है खतरा?
सर्दियों में हवा की गति कम होने और वातावरण में प्रदूषकों के फैलाव की परिस्थितियां प्रतिकूल होने से धुआं लंबे समय तक जमीन के करीब जमा रह सकता है। पराली, कूड़ा, निर्माण कार्य, वाहन और औद्योगिक उत्सर्जन मिलकर प्रदूषण का स्तर बढ़ाते हैं। कूड़े में प्लास्टिक, रबर और रासायनिक पदार्थ जलने से जहरीली गैसें और सूक्ष्म कण निकलते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार इससे फेफड़ों, आंखों और तंत्रिका तंत्र पर गंभीर असर पड़ सकता है।
समाधान के लिए सख्ती के साथ व्यवस्था जरूरी
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल जुर्माना लगाने से समस्या खत्म नहीं होगी। घरों में गीले और सूखे कचरे को अलग करना, कचरे का नियमित संग्रह, वैज्ञानिक निस्तारण और पराली के वैकल्पिक उपयोग को बढ़ावा देना जरूरी है। किसानों को मशीनें और आर्थिक सहायता उपलब्ध कराना भी अहम है। वायु प्रदूषण किसी एक राज्य की समस्या नहीं है। पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और दिल्ली को मिलकर काम करना होगा। अन्यथा हर साल सर्दियों में धुएं और जहरीली हवा का संकट दोहराता रहेगा।


